गतांक से आगे... 
               
          राजीव ने जैसे ही प्रीति की खबर अखबार में पढ़ी! 
उसने अनिल जी को फोन लगाया! 
उधर से वसुधा जी ने फोन उठाया और कहा हैलो! 
राजीव- प्रणाम! मैं राजीव बोल रहा हूँ! प्रीति कैसी है! 
उसकी खबर मैंने अभी- अभी अखबार में पढ़ी है! 
वसुधा जी- ठीक नहीं है, पूरे शरीर पर जख्म हैं! इतना कहकर वो रोने लगीं!

राजीव- पूरी बात बताइए कैसे क्या हुआ? 
वसुधा जी- प्रीति को उसका पति शादी के छह महीनें बाद से ही प्रतारित करने लगा था! और पैसे की माँग करने लगा! प्रीति के विरोध करने पर उसे मारता पिटता था! 
राजीव- ये सारी बातें प्रीति ने आपको कभी बताया नहीं? 

वसुधा जी- शुरु- शुरु में अपने सास- ससुर को बताया तो उन लोगों के समझाने पर कुछ दिन सब ठीक रहा लेकिन, फिर झगड़ा शुरु हो गया! फिर पहली बार जब प्रीति को चोट पहुँचाया तो प्रीति यहाँ आ गई! 

राजीव- आप लोगों ने इतनी बड़ी बात छुपाई क्यों? 
कुछ कहा क्यों नहीं मनीष को? 

वसुधा जी- हम सब डर गए थे कि ये दुनियाँ और समाज क्या कहेगा? प्रीति को समझा- बुझा कर वापस भेज दिया हम लोगों ने!  कुछ दिन सब ठीक रहने के बाद फिर प्रीति को मनीष ने बहुत मारा- पीटा है और जान से मारने की कोशिश भी की! किसी तरह जान बचाकर पड़ोस के घर गई और फिर पड़ोसियों ने पुलिस को बुलाया और मनीष को पुलिस ले गई! 

मार- पीट करने और जान से मारने के जुर्म में मनीष जेल चला गया है! 
अपनी छोटी बेटी का सर अपने गोद में रखकर सोच में गुम वसुधा जी की तंद्रा भंग होती है और उन्होंने एक गहरी सांस छोड़ी और कहती है! बस बहुत हो चुका! 
सुधा के साथ भी ऐसा ही अन्याय हुआ, लेकिन, उसका फिर से घर बस गया! 
अब मुझे एक सशक्त फैसला करना है! प्रीति को आत्मनिर्भर बनाना है! इतना कहकर वसुधा जी प्रीति से बोली! 
उठो प्रीति! इन सब बातों को भूल कर आगे की सोचो! मनीष को अपने किए की सजा अवश्य मिलेगी! बस तुम खुद को दृढ़ इच्छाशक्ति से मजबूत करो और आत्मनिर्भर बनो! प्रीति भी अपने- आप को संयत करते हुए मन ही मन कुछ फैसला करती है! 

समीक्षा- यह कहानी एक सत्य घटना पर आधारित है और इसे लिखने का यही उद्देश्य है कि, दहेज की लोलुपता सिर्फ अनपढ़ और गरीब घरों में नहीं होती बल्कि कुछ उच्च वर्ग और पढ़े- लिखे घरों में भी देखने- सुनने को मिलती है! 
इस तरह की घटनाएँ अक्सर धटित होती रहती है! जब बेटी को माता- पिता समान शिक्षा देते ही हैं तो फिर शादी की जल्दबाजी क्यों? उन्हें पढ़ने का समय दिया जाए! अपने पैरों पर खड़ी हो सके बेटियाँ, ताकि कोई कौशिक या मनीष उसे शारिरिक और मानसिक प्रतारणा न दे सके! साथ ही साथ माता- पिता को अपनी सोच बदलनी होगी कि "समाज क्या कहेगा? "
अपनी बेटी के लिए जो सही हो वही कदम उठाना चाहिए ताकि फिर कोई सुधा और प्रीति न बन सके!! उन्हें पढ़ने दिया जाए और अच्छे- बुरे का ज्ञान भी दिया जाए ताकि आगे कभी कोई विपरीत परिस्थिति आए तो सामना कर सके!! 

समाप्त! 

श्वेता कर्ण