चल रहे झंझावात में सारे,
अपनी कश्तियाँ,अपने किनारे,
तूफानों में पुरजोर सम्हाले हैं
उस पार न जाने क्या हों नजारे....?

उठती लहरों को देखते हैं
हर नयी दुविधा को हैं स्वीकारे,
बढ़ा चुके हैं गति अपनी
निकल गये तोड़ अपने दायरे,
तूफानों में पुरजोर सम्हाले हैं
उस पार न जाने क्या हों नजारे....?

उम्मीद का चप्पू चला रहे हैं
पाने को आसमाँ से अमन के तारे,
है भरोसा की वक्त बदलेगा
बढ़ रहे आपस में थाम हाथ सारे,
तूफानों में पुरजोर सम्हाले हैं
उस पार न जाने क्या हों नजारे....?

विश्वास है कि ये डूबेगी नहीं
त्याग दिये विचार जिनसे थे हारे,
अब चले जिन्दगी का स्वाद लेने
बहुत हो गये हमें अनुभव खारे,
तूफानों में पुरजोर सम्हाले हैं
उस पार न जाने क्या हों नजारे....?

नाव हमारी डोलती सी चली
मिले आखिर मंजिल पाने के इशारे,
बहुत लड़े हम जीने को सतत् 
कुछ साथी भी इस युद्ध में गये मारे,
फिर भी तूफानों में पुरजोर सम्हाले हैं
उस पार न जाने क्या हों नजारे....?

स्वरचित व मौलिक✍
सुमित सिंह पवार "पवार"
उत्तर प्रदेश पुलिस
आगरा