वो दौर अलग था ,वो शामें थीं सुहानी,
जहाँ बैठकर सब कॉफी के बहाने,
करते थे बहुत देर तक मन मानी।
कहाँ कुछ होठों से कह पाते थे,
राजे दिल नजरों से कहे जाते थे,
आज ताजा हो गयीं जहन में यादे वो पुरानी।
वो टाइमपास करने को कैफे में चले जाना,
वो कॉफी की चुस्कियों के साथ लुत्फ जिन्दगी का ले आना,
हैं याद आहिस्ता 2 वो नजरों से लिखी कहानी।
आज भी उस मोड़ से जब गुजरते हैं,
हम तेरे साथ यादों में आज भी उसी कैफे पर बैठे रहते हैं,
क्या मस्त थी तेज वो दोपहरी, बातें कुछ थीं अनकही अनजानी।
कभी मेरा सकपकाना , कभी तेरा घबराना,
कभी हाथों से किताबों का गिर जाना ,
फिर दोनों का साथ में गिरी किताबों को उठाना,
बस सिमटकर रहे गयीं वहीं यादें , वो दस्ताने थीं बड़ी रूहानी।
अंजू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश ।

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