न चाह कुछ कर गुजरने की,
न आस कुछ अब बदलने की,
झाँकना है बस औरों की गलतियों पर
ये खिड़कियों का शहर है बाबू
यहाँ जरूरत नहीं हर बात कहने की....।
दुख से अपने दुखी नहीं है,
सुख से तेरे वो छिपे नहीं हैं,
चक्षु तुझसे कभी हटे नहीं हैं,
किसको परवाह है तेरे बिखरने की
ये खिड़कियों का शहर है बाबू
यहाँ जरूरत नहीं हर बात कहने की....।
तेरी हँसी कब बनेगी पता न चलेगा,
खुशी उन्हें मिलेगी,जो संग तेरे होगा,
बर्बादी में तेरी कोई चहेता भी होगा,
नौटंकी जो करता रहा संग चलने की
ये खिड़कियों का शहर है बाबू
यहाँ जरूरत नहीं हर बात कहने की....।
मुकद्दर से तो लड़ लेगा,
नसीब को भी बदल देगा,
गद्दारों को कैसे पहचानेगा?
जिनको आदत है आस्तीन में पलने की
ये खिड़कियों का शहर है बाबू
यहाँ जरूरत नहीं हर बात कहने की....।
चौकन्ना रह बस,सब सामने आयेंगें,
सच्चाई की बारिश में बाहर आयेंगें,
आखिर कब तक मुखौटा लगायेंगे,
तू बस तैयारी पुरजोर कर अपने उगने की
ये खिड़कियों का शहर है बाबू
यहाँ जरूरत नहीं हर बात कहने की....।
स्वरचित व मौलिक✍
सुमित सिंह पवार "पवार"
उत्तर प्रदेश पुलिस
आगरा

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