"माँ मुझे पहिचनों !!!
मैं तेरी बेटी हूँ !!!

पल रही तेरी कोख में तेरी ही रूह का हिस्सा हूँ।
अनजान हूँ मैं इस दुनियां से बस इक अनछुआ किस्सा हूँ।।
तेरी इस ममता भरी कोख में खुद को महफ़ूज पाती हूँ।
माँ मुझे पहिचनों........

सुनती हूँ बाहर से जब कोई आहट तो डर से कांप जाती हूँ।
कल्पना  करती  हूँ  उस  दर्द की तो  बेचैन हो जाती  हूँ।।
देती है जब थपकी प्यार की तो सच्चा सुकून पाती हूँ।
माँ मुझे पहिचनों.........

रंगीन सी दुनियां के नजारे माँ मुझको भी देखने दो।
आने दो मुझे इस दुनियां में और बचपन के खेल खेलने दो।।
तेरे आँचल की छांव में मैं जागती और सोती हूँ।
माँ मुझे पहिचनों...........

खनकने दो मेरे हाथों की चूड़ी और पायल को छन-छन छनकने दो।
उड़ने दो मुझे पंख फैलाकर माँ आसमाँ की ऊंचाइयों को छूने दो।।
फ़लक के सितारों जैसी अनमोल आपकी बेटी हूँ।
माँ मुझे पहिचनों.....

माँ मुझे पहिचनों में तेरी बेटी हूँ"।।

शीला द्विवेदी"अक्षरा"