वह तोड़ती पत्थर वैसे ही,
इलाहाबाद के पथ पर ही।
वह उठाती गारा आज भी,
बनती ऊंची इमारतों की ।।
आज भी वह डामर बिछाती,
झुलसाती दोपहरी में भी ।
सुस्ताने पल भर छांव नहीं ,
न प्यासे कंठ को ठंडा पानी।।
पत्थर तोड़ते,सडक बिछाते,
तपते धूप में श्रमिकजन वे।
ऊंची इमारत बनाते हैं ,
पर होते घर एक न उनके।।
न भरपेट खाने को मिलता,
न सर छिपाने एक घर होता।
इमारत जब खड़ा हो जाता,
नाम कहीं नहिं इनका होता।।
द्रवित हुआ हृदय "निराला" का,
तोड़ती पत्थर जब था देखा।
इलाहाबाद के पथ पर क्या,
हर जगह यही हाल श्रमिक का।।
बनना हमें निराला जैसा,
करुण हृदय सबका है होना।
श्रमिकों के लिये सदा होना,
अपने दिल में भी एक कोना।।
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर "
(मई दिवस पर श्रमिकों को समर्पित)

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