तेरे सुंदर से नैनो में जरा काजल लगाता हूं,
में लेखक श्रृंगार रस का हूं जरा तुझको सजाता हूं।
जरा बैठो मेरे हमदम में तुझसे बात करता हूं,
हूं अनजान अब-तक में थोड़ी पहचान करता हूं।
तेरे सुंदर से हाथों में थोडी मेंहदी लगाता हूं,
नहीं आता लगाना भी मन ही बताता हूं।
तेरी सुंदर सी मनमोहक छवि किसने बनाई है,
बनाकर इस धरा पर क्या क़यामत ढाई है।
में अपनी सुध-बुध में खोकर सारे जग को भूला हूं,
नहीं काबू मेरा अपना में इतना तुझमें डूबा हूं।
तेरी पायल की वो खनके मेरे दिल को बुलाती है,
मयूर सी कोकिला बोली तेरी जब जब ये आती है।
तेरे सुंदर से नैनो में जरा काजल लगाता हूं,
में लेखक श्रृंगार रस का हूं जरा तुझको सजाता हूं।
स्वरचित@✍️लक्ष्मीनारायण।

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