हे ज्ञान मुद्रा , हे ब्रहाम्मनंदा ,स्वागत आपका वसुधा में
सद् बुद्धि, सत्मर्ग, प्रशस्त करो ,स्वागत आपका वसुधा  में!!

हे चितरूपा, हे भवप्रीता, आन विराजो आसन में ,
श्रृष्टि को ज्ञानमय कर देती, हर लेती तम अज्ञानी का ,
ये अज्ञानता  का बंधन छूटे, मां तेरे आशिषों से,
एक अलख विद्या की जग जाती, मां तेरे वरदानों से !!!

हे ब्रह्मवादिनी, हंसवाहिनी ,वर विद्या का देना मां,
शब्दों को मुखरित कर पाऊं,वाणी में स्वर मैं भर पाऊं,
ना भटकूं मैं मृगतृष्णा में ,भवसागर से तर जाऊं ,
हे महाविद्या , हे कलानिधि ,स्वागत आपका वसुधा  में!!!

श्वेत तेरा श्रंगार सजे मां , आंगन महके फूलों से,
दुनिया मेरी खुशहाल करो मां,अपने चरणों की धुलों से,
हर मन का तिमिर मिटा दो मां,अपने आशीष की वर्षा से,
हे सुवासिनी , हे सुर वंदिता, स्वागत आपका वसुधा में!!

        स्वरचित ,मौलिक 

          कीर्ति चौरसिया
    जबलपुर (मध्य प्रदेश)