ईश एक है रूप दो निराकार भी है साकार है।
या खुद तेरा रंग मंच इक द्वेत मय संसार है।।
प्रेम ईश्वर है जगत का हर दिल यहाँ पर जन्नत है
"साथ रहकर भी जुदा रहना हमारी किस्मत है"।।
प्रेम से मीरा ने चाहा है पहिचान राधा प्रेम की।
प्रेम से परिपूर्ण है हर एक गोपी ब्रजधाम की।।
फिर भी अधूरा रह गया वो इश्क जिसकी चाहत है।
" साथ रहकर भी जुदा रहना हमारी किस्मत " है।।
है दुख की रात काली तो सुख का सवेरा लाएगी।
थाम कर उम्मीद का दामन इक रश्मिरथ संग आएगी।।
इश्क में मिलना- बिछुड़ना ये कैसी उल्फ़त है।
"साथ रहकर भी जुदा रहना हमारी।किस्मत है"।।
पहुंचाती हमें लक्ष्य तक उन पटरियों का कोई लक्ष्य नही।
जो संगम कराते है सागर और नदी का वो कभी मिलते नही।।
शीला द्विवेदी"अक्षरा"

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