हर कली फूल नही बनती
कभी गजरे कभी माला
कभी वेलेंटाइन की गिफ्ट
कभी गजलों ओर नगमों
तो कभी तवायफ की अदा 
 इन बाजारों तक ही सीमित 
हर कलीचाहती है फूल बनू
महकू खुशबू बिखरा उ
देवो के सर चढू भाग्य पर इतराओ 
पर क्या कोई बता पाया खोल पाया कली का भाग्य



संध्या पंवार राजस्थान