कितने शिकवे कितनी शिकायते दिल मेरा करता है,
जब कभी भी अकेलापन उसे खलता है।
तुमसे दूर जाना इसको एक गुनाह सा लगता है,
हालात के आगे बेबस होकर गुनाह यह करता है।
कोई मौसम , कोई मयकश इसे तसल्ली नही देता,
जब यह बेजार होकर तेरी चाहत में तड़पता है।
वो सुकून वो मोहब्बत न पा सका जमाने में,
जो अपनापन मेरे महबूब तुझसे मिलता है।
कितनी यादे आज भी बिखरी हैं उस मोड़पर,
जब भी गुजरे चलते कदमों में एक गुबार उलझता है।
कमी नही इस जहाँ मे चाहने बालों की अंजुम,
पर दिल को कौन समझाए उसे न कोई जचता है।
मिल जाती है बेहत्तर शक्लो सूरत उनसे,
पर वो अपनाइयत से भरा दिल नही मिलता है।
बहुत उकसाते है दिल को यह काफिर नजारे,
कहते बन जाओ हमारे, पर कुछ पल को ही सब भाताहै।
अंजू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश

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