पिता का साया सर से हटते ही आकाश के ऊपर छोटे भाई बहिन और माँ की जिम्मेदारी आ गई थी।
पारिवारिक स्थिति को देखते हुए उसने अपनी पढ़ाई बन्द कर एक कम्पनी में मैनेजर की नौकरी कर ली।

जिस कम्पनी में बो काम करता था उसी कम्पनी के मालिक की बेटी थी स्नेहा।
कहने को तो बो मालिक की बेटी थी,लेकिन  बो एक साधारण वर्कर की तरह ही कम्पनी में काम किया करती थी।और सभी कर्मचारियों के साथ समानता का व्यवहार करती थी ।

उन्ही बहुत से कर्मचारियों में एक आकाश भी था,जो बेहद ईमानदारी और लगन से अपना काम किया करता था।

आकाश की इसी ईमानदारी औऱ सादगी ने स्नेहा का मन मोह लिया,और बो आकाश को मन ही मन चाहने लगी।

एक दिन अचानक आकाश काम पर नही आया।तो स्नेहा उसका हाल जानने के लिए उसके घर पहुंच गई, और देखती है कि आकाश की बहिन की तबीयत खराब होने की बजह से बो काम पर नही गया।

स्नेहा ने आकाश से कहा-"कि आकाश तुम काम पर चले जाओ तुम्हारी बहिन को मैं देखती हूँ।क्योंकि अगर तुम काम पर नही गए तो तुम्हारा बेतन काट दिया जाएगा"।

आकाश-" आप ये सब कैसे करेंगी"।

स्नेहा-तुम जाओ आकाश में कर लुंगी।

तो फिर ठीक है कहकर आकाश चला गया।

स्नेहा जिसके सर से बचपन में ही माँ का साया उठ गया था,बो अपनी नानी-नाना के यहां पली बढ़ी थी,और वही के संस्कार भी थे उसमें।

अपने महल जैसे घर  और मखमली गद्दों पर सोने वाली स्नेहा एक प्यारे परिबार का साथ और सादगी भरा जीवन जीना चाहती थी।
जो उसे आकाश के घर में दिखाई दिया।

कहते है कि माँ अपने बच्चों की बिना कहे सारी बात जान जाती है, और आकाश की माँ भी स्नेहा की मन की भावनाओं को पहिचान गयी।
 कि-इतने बड़े घर की बेटी अगर मेरी बेटी की बीमारी में देखभाल कर सकती है, तो निश्चित ही ये मेरी बहु बनने लायक है।

और उन्होंने प्यार से स्नेहा के सर पर हाथ रखकर कहा कि-"बेटा क्या तुम मेरे घर की बहू बनोगी"??

और कुछ दिनों में स्नेहा  बड़े घर की बेटी से एक संस्कारी परिवार की बहू बन गयी।

स्वरचित एवं मौलिक

               शीला द्विवेदी     
              उरई,जालौन ,उत्तर प्रदेश