वो बचपन कितना सुहाना लगता था,
जब संयुक्त परिवार हुआ करता था।

थपकी देकर जब गाती वो ताई-चाची लोरी थी,
जो स्वप्न लोक में ले जाती वो दादी-नानी की कहानी थी।

माँ पापा से मतलब न था दादी-दादू के दुलारे थे,
ताऊ-ताई चाचा-चाची सब हमको लड़ लड़ाते थे।

घर में बुआ के आने पर मिष्टान्न के डिब्बे आते थे,
जाने पर देती पैसे जब तो बड़े मना फिर करते थे।

एक ही रंग की पोशाकें जब त्यौहारों पर पहनते थे,
हो ब्रेकफास्ट या लंच डिनर सब एक साथ में करते थे।

होती थी छुट्टी गर्मी की तो नानी कर घर हम जाते थे,
फिर छुपन छुपाई गिल्ली डंडा कंचों में दिन कट जाते थे।

उन लाल हरी पतंगों संग मन आकाश में उड़ जाता था,
कैरम खेलने वाले मन को pbgi तनिक न भाता था।।




शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश