कल तक थे जो आसमानी ,
आज क्यों ?
मन के व्योम रक्त रंजित हो गए।
तुम चले परदेश साजन हम तो रोए हिलकी भर,
होठों से तुम मुस्कुराए, पर, ह्रदय से व्यथित हो गए।
कितना चाहा दिल ने तुमको ,आगे बढ़कर रोक लूँ,
एक कदम ही बड़े , सामने प्रश्न समस्याओं के उपस्थित हो गए।
यह भयानक आपदा,मन करता त्राह त्राह,
पर भूख सबसे बड़ी विपदा, सामने इसके सारे डर तिरस्त हो गए।
कदम तुम्हारे भी आज जाते वक्त थे भारी बहुत,
थे बहुत मजबूर हम भी ,तेरे जाने से, जड़बत स्थिर हो गए।
जिम्मेदारियों का, बोझ लिए तुम बड़े फिर क्यों?? पीछे न मुड़े,
मैं जानती हूँ ,तुम पुरुष हो पत्थर नहीं, नयन तुम्हारे भी द्रवित हो गए।
जीवन का यही नियम है, जो चले हर हाल में,
वो मिशाल बन गए, जो न चले वो आवारा में चिन्हित हो गए।
तुम भी साजन बहला लेना अपने मन को हर हाल में ,
हम भी कर पाषाण ह्रदय खुदको, दैनिक कार्यों में रत हो गए।
समाज में है उन्ही का नाम, पा सके वो ही कुछ मुकाम,
मुँह मोड़ कर जो मोहब्बतों से, कर्तव्यों को समर्पित हो गए।
अंजू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।

0 टिप्पणियाँ