स्कूल में मैं और मेरी चार दोस्त-पढ़ने में ज़हीन माने जाते थे। अध्यापिकाओं की नजरों में भी हमारी बहुत इज़्ज़त थी।उनके अनुसार हम पांचों दोस्त बहुत पढ़ाकू थे परीक्षा में नंबर भी अच्छे आते थे।
लाइब्रेरी खाली पीरियड में लाइब्रेरी में बैठना हम लोगों का नियम था। वहाँ पढ़ाई करते थे या इधर उधर की बातें। गर्ल फ्रेंड-बॉय फ्रेंड की बातें नहीं होती थीं क्योंकि मेरा स्कूल लड़कियों का महिला विद्यालय था। हाँ कहीं से कोई चटपटी खबर मिल जाती तो उसपे डिस्कसन करने का सबसे महफूज़ जगह लाइब्रेरी होती थी। कोई लड़की यदि 10th क्लास में है और उसकी शादी हो गई तो वह स्कूल में चर्चा का विषय बन जाती थी। कई लड़कियां तो शादी के बाद सिंदूर लगाकर तिरछी मांग निकाल कर उसे छुपा कर रखती थीं लेकिन लड़कियाँ पता करके ही रहती थीं कि उसकी शादी हो चुकी है। इस तरह की कई अध्यापिकाओं के जीवन में भी ताक झाँक करना भी एक बहुत ज़रूरी काम होता था।
इन्हीं सब ज़रूरी कामों में हम पाँच दोस्त बहुत व्यस्त रहते थे। हाँ परीक्षा नज़दीक आने पर दिन रात एक करके अच्छे नंबर आ जाते थे और विद्यालय में चौड़े होकर रहते थे।
खैर स्कूल के बाद कॉलेज और उसके बाद विवाह उस समय एक लड़की में घर वालों की यही प्राथमिकता होती थी।
अतः मेरे साथ भी वही हुआ स्नातक करने के वाद घरवालों ने युद्ध स्तर पर विवाह खोजना शुरू किया। किसी तरह मैंने परास्नातक प्राइवेट छात्र के रूप में किया और उसके बाद शादी हो गई।
मैं दिल्ली आ गई। कुछ समय घूमने टहलने के बाद एक प्राइवेट स्कूल में जूनियर क्लास की अध्यापिका की नौकरी मिल गई।
अब कोई डिग्री तो थी नहीं तो इससे अच्छा क्या मिलता। और महीने भर खटने के बाद सैलरी कितनी मिलती थी ये आपलोग समझ ही गए होंगे। रजिस्टर पर 12000 पर दस्तखत कराकर 2000 ₹देते थे।
दो तीन साल बीत गए। एक दिन मैं बस से स्कूल से घर आ रही थी। उस बस में मुझे एक लड़की घूर कर देखे जा रही थी। मैंने भी नोटिस किया कि वह मुझे देख रही है। मेरा स्टॉप आ गया था मैं बस से उतर गई। वह शादीशुदा लड़की भी बस से उतरकर मेरे पास आकर बोली-"आप का नाम उमा गुप्ता है?"
मैंने कहा-" क्यों क्या हुआ'?
लड़की-"आप गोरखपुर में रहती हैं?"
अब मैं थोड़ी नरम हो गई ।
अपने मायके का नाम सुनकर हर लड़की का दिल खुशी से भर जाता है।
मैंने कहा"-हाँ
उसने पूछा-"आप बी. पी स्कूल में पढ़ती थीं।
मैंने सहमति में सिर हिलाया।
वह बोली -"मैं आभा रानी !आपके साथ पढ़ती थी। मैं 'बी' सेक्शन में थी।
मैं 'ए'सेक्शन में थी।
आपकी सहेली विनीता से मेरी बात होती थी कभी -कभी।
मुझे उसका चेहरा नहीं याद आ रहा था।
अब मैं उससे खुलकर बातें करने लगी
उसने मुझे बताया कि वह यहां एक अस्पताल में नर्स हैऔर यहीं नज़दीक ही रहती है।
हम दोनों ने एक दूसरे को अपने घर आने का निमंत्रण दिया और विदा लिया।
घर आकर मैं सोचने लगी कि ये नहीं मायने रखता आप में कितनी योयता है या आपके पास कितनी डिग्रियाँ हैं
मायने रखता है कि आज आप कितने कामयाब है।
मैं अपने स्कूल की तेजू खां आज एक प्राइवेट स्कूल में न के बराबर तनख्वाह पर पढ़ा रही थी और आभा जो ठीक ठाक ही थी पढ़ने में, आज सरकारी नौकरी कर रही थी।
मुझे उसदिन उससे मिलकर बहुत खुशी हुई क्योंकि विवाह के बाद हम चारो दोस्त अलग हो गए थे। बाते भी नहीं हो पाती थीँ। मिलना तो दूर की बात थी। इस दूसरे शहर में अब आभा मेरी बहुत अच्छी दोस्त बन गई थी।
इसलिए कहते है दुनियाँ गोल है। कब कौन कहाँ मिल जाये कह नहीं सकते।
स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेहिल'
नई दिल्ली

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