कभी - कभी मजबूरी और बेबसी में इंसान ऐसा काम कर जातें हैं जिन्हें वह जानते हैं कि यह काम अनुचित है , गलत है और शायद इसी को तों हालात की विवशता का नाम दिया जाता है । बेबसी के उन पलों में इंसान के सोचने - समझने की शक्ति क्षीण हो जाती है और वह इंसान कुछ ऐसा कर गुजरता है जिसका अफसोस उसे ताउम्र रहता है पर उस वक्त के हालात ऐसे होते हैं कि इंसान उस काम को करने के लिए बेबस हो जाता हैं ।
रमिया और उसके परिवार की कहानी भी कुछ ऐसी ही हैं जो एक ऐसे ही हालातों का शिकार होने के लिए बेबस थें । रमिया और उसका पाॅंच साल का बेटा यही तों रमिया के परिवार थे । जब रमिया का बेटा तीन बरस का था तभी उसका बापू जहरीली शराब पीने की वजह से मर गया । रमिया का पति जहाॅं चौकीदारी करता था वहीं पर उसके मालिक ने दरियादिली दिखाते हुए उन्हें रहने के लिए नौकरों वाला कमरा दे दिया था ।
रमिया जवान और खूबसूरत थी । गरीबी के बीच गाॅंव में पली - बढ़ी रमिया की शादी जब रामकिशोर के साथ हुई तब उसकी उम्र मात्र पंद्रह बरस की ही तों थी । रमिया का पति रामकिशोर शहर में एक कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूरी करता था । शादी के दूसरे दिन ही वह रमिया को लेकर शहर आ गया । जिस बस्ती में रामकिशोर रहता था वह बस्ती मजदूरों की ही बस्ती थी । रमिया शहर आकर बेहद खुश थी ।
बस्ती में रमिया की खुबसूरती के चर्चे होने लगें । उसकी बड़ी-बड़ी ऑंखें , उसके नाक - नक्स , सुंदर काया और शरीर की आकर्षक बनावट ऐसी थी कि जों भी उसे देखता उसकी खुबसूरती में खो जाता । कहते हैं हर स्त्री की खुबसूरती उसके व्यक्तित्व में चार चांद लगा देते हैं । ऐसा रमिया के साथ भी हुआ लेकिन एक दिन ऐसा भी आया कि रमिया की यही खुबसूरती और उसका व्यक्तित्व उसके लिए अभिशाप साबित हुआ ।
रामकिशोर जिसके यहाॅं मजदूरी करता था उसकी बुरी नीयत रमिया पर थी । वह पिछले दो दिनों से मौके की तलाश में था लेकिन उसे रामकिशोर की वजह से मौका नहीं मिल पा रहा था । उसने योजना बनाई और योजना के तहत उसने रामकिशोर को कंस्ट्रक्शन साइट पर ही इतनी शराब पिलाई कि वह बेचारा वहीं पर शराब के नशे में लुढ़क गया जिसका फायदा उसके मालिक ने उठाया और पहुॅंच गया उस बस्ती में जहाॅं रमिया रहती थी ।
रमिया रोती रही उस दरिंदे से अपनी इज्जत की भीख माॅंगती रही लेकिन हष्ट-पुष्ट शरीर वाले दरिंदे की वासना के आगे वह हार गई और वह उस वहशी दरिंदे से अपने आप को बचा नहीं पाई । वह रमिया के साथ तब तक मनमानी करता रहा जब तक कि उसका मन नहीं भर गया । अपनी फटी हुई ब्लाऊज और नोंचे हुए जिस्म के साथ रमिया दरवाजे के पीछे मुॅंह छिपाकर रात भर रोती रही ।
सुबह रामकिशोर के घर लौटने तक का आभास रमिया को नही हुआ । अपनी पत्नी की ऐसी हालत देख वह स्तब्ध रह गया । रमिया को अपनी तरफ भींगी और सूज़ी हुई ऑंखों से देखता देख रामकिशोर को आत्मग्लानि का एहसास हुआ और उसने रमिया को गले लगा लिया । रमिया को देखते ही जिस आशंका ने उसके दिमाग में जगह बनाई थी रमिया द्वारा रोते हुए कही जाने वाली बातों ने उसकी पुष्टि कर दी थी ।
रामकिशोर गुस्से में अपने मालिक के घर पहुॅंचा । मालिक की पत्नी और बच्चों के सामने वह बोलने ही वाला था कि तभी उसका मालिक नोटों की गड्डियों को अपने दाएं हाथ से हिलाता हुआ उसके सामने खड़ा हो गया । रामकिशोर कुछ समझ पाता उससे पहले ही उसके मालिक ने उसे पैसे देते हुए नौकरी से निकाल देने की धमकी दें डाली । उसकी गरीबी का हवाला देकर उसके अंदर डर पैदा कर दिया ।
अनिश्चितता और डर रामकिशोर और रमिया की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा बन गए । अपने घर के लिए देखें गए सपने और नौकरी की उम्मीदी के इन हालात और मजबूरी का फ़ायदा उसका मालिक क्रूरता के साथ उठाता गया जिसका खामियाजा रमिया शारीरिक रूप से और रामकिशोर मानसिक तौर पर झेल रहे थे ।
रामकिशोर के मालिक का जब रमिया से मन भर गया उसने खाने में पड़े कंकड़ की तरह रामकिशोर और रमिया को अपनी जिंदगी से निकाल फेंका ।
दोनों अब सड़क पर आ गए ।
बेघर और भूखे - प्यासे रामकिशोर और रमिया कई दिनों तक काम की तलाश करते रहे लेकिन उन्हें काम नहीं मिला । कुछ लोगों की निगाहें रमिया की खुबसूरती देखकर उसके शरीर के अन्य भागों पर ऐसे भटकती जिसे देखकर रामकिशोर की ऑंखें उन लोगों की ऑंखों में छुपे वासना को देख लेती और वह रमिया का हाथ पकड़ तुरंत ही वहाॅं से निकल पड़ता ।
सामने से आती गाड़ी को रमिया देख नहीं पाई और वह गाड़ी के सामने चक्कर खाकर गिर पड़ी । भूख - प्यास ने रमिया और रामकिशोर से चलने की भी शक्ति छीन ली थी । ऊपर से जेठ की चिलचिलाती धूप और गर्मी ने उन दोनों को बेहाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी इसी का नतीजा यह हुआ कि रमिया एक गाड़ी के आगे गिर पड़ी ।
रामकिशोर उसे उठाने की कोशिश कर ही रहा था कि एक महिला ने उसकी तरफ पानी की एक बोतल बढाई और कहा कि इसके मुॅंह पर पानी की छींटें जल्दी से मारो । पानी की छींटें मुॅंह पर पड़ते ही रमिया को होश आया । पानी पीकर रमिया को कुछ राहत मिली और वह रामकिशोर की मदद से खड़ी हों गई ।
उस महिला के साथ उसका पति भी उसके साथ था । दोनों पति-पत्नी रामकिशोर से अकेले में बातें करने लगे और रमिया उन्हें देखती रही । रामकिशोर के चेहरे पर आज बहुत दिनों के बाद रमिया ने खुशी देखी थी । वह समझ गई कि रामकिशोर को नौकरी मिल गई है । दोनों ने भगवान को धन्यवाद दिया और गाड़ी में बैठ कर उन दोनों पति-पत्नी के साथ अपने अगले गंतव्य की तरफ निकल पड़े ।
धीरे - धीरे रमिया और रामकिशोर की जिंदगी पटरी पर आने लगी । रामकिशोर के नए मालिक ने उन्हें रहने के लिए सर्वेंट क्वार्टर दिया । नए मालिक के यहाॅं रामकिशोर चौकीदारी करने लगा और रमिया अपनी मेमसाब के घर का काम । दोनों की जिंदगी अब खुशनुमा गुजरने लगी थी ।
उस खुशनुमा जिंदगी में चार चाॅंद लग गए जब एक साल बाद रमिया को पता चला कि वह माॅं बनने वाली हैं । रमिया को एक नई जिंदगी का एहसास हो रहा था । यह एहसास उसे रोमांचित कर रहा था । उसके चेहरे का नूर बढ़ने लगा । अपने बच्चे के लिए वह खुश रहने लगी । उसकी मालकिन भी उसका बहुत ख्याल रखती थी । मालिक - मालकिन की झोली अभी तक खाली थी शायद यही वह वजह थी कि उसकी मालकिन रमिया का विशेष ध्यान रखती ।
उस छोटे से सर्वेंट क्वार्टर में खुशियां छा गई जब नौ महीने बाद रमिया की गोद में उसका बेटा आया । गोरा रंग और नयन - नक्स सब कुछ उस नन्ही सी जान ने अपनी माॅं जैसे ही तों पाएं थे । इतने सुन्दर और मासुमियत से भरपूर बेटे को पाकर रमिया के साथ - साथ रामकिशोर की भी खुशी का ठिकाना नहीं रहा । रामकिशोर और रमिया के मालिक - मालकिन भी बहुत खुश थे ।
जैसे - जैसे रमन बड़ा होने लगा उसकी मासूमियत बढ़ती गई । रमन ! रमिया और रामकिशोर का बेटा । यही नाम तों उसने अपने बेटे को दिया था । रमन का अधिकांश समय अपनी मालकिन के घर में ही
बीतता । रमिया वहाॅं काम करती और रमन खेलता रहता । रमन अपने मासूम चेहरे से जब मुस्कुराता
रामकिशोर और रमिया के दिलों में खुशी की लहर दौड़ जाती और वें दोनों अपनी दिन भर की थकान भूल जाते और बच्चे को गोद में उठा उसके साथ खेलने लगते ।
रमन अब तीन बरस का हों चुका था । रामकिशोर की एक बुरी लत थी जो वह छोड़ ही नहीं पा रहा था । वह शराब के अड्डे पर रोज जाता और शराब लेकर घर में आता और फिर मौका मिलते ही चढ़ा लेता । रमिया मना करती तों कहता कि मेरी जान ! सब पीते हैं और कौन सा मैं पीकर पड़ा रहता हूॅं । रात में जागने के लिए ही तों रोज पीता हूॅं ।
रात में जागने के इरादे से पी गई शराब ने रामकिशोर को एक दिन सदा के लिए सुला दिया । सुबह मेन गेट के पास ही उसकी लाश मिली । रमिया का रो - रोकर बुरा हाल था । तीन बरस के मासूम बच्चे को क्या खबर की उसके सिर से पिता का साया उठ चुका है । रमन भी रो पड़ता जब वह अपनी माॅं को रोते हुए देखता ।
रमिया विधवा हो चुकी थी । सफेद साड़ी पहनना उसकी नियति बन चुकी थी । उसकी और रमन की जिंदगी सर्वेंट क्वार्टर में ही कट रही थी । वक्त बीतने लगा । एक दिन रमिया के लिए उसका मालिक यह कहकर रंग - बिरंगी साड़ियां ले आया कि तेरी मालकिन ने तेरे लिए मुझे लाने को कहा था । भगवान की कृपा मालिक - मालकिन पर हुई और उसकी मालकिन प्रेगनेंट हो गई । रमिया अपनी मालकिन का खास ख्याल रखती क्योंकि शादी के दस साल बाद उसके मालिक - मालकिन के घर में यह खुशियां आने वाली थी ।
रमन को सुला कर रमिया सोने ही वाली थी कि उसे अपने शरीर पर स्पर्श का आभास हुआ । उसे महसूस हुआ कि वह स्वप्न देख रही है क्योंकि रामकिशोर को इस दुनिया से रुखसत हुए एक बरस बीतने के बाद भी वह उसे नहीं भूल पा रही थी । रमिया उस स्पर्श को अपने अंदर समेटने की कोशिश कर ही रही थी कि उसे आभास हुआ कि वह स्वप्न नहीं देख रही है बल्कि उसके साथ वास्तव में वह घटित हो रहा है ।
रमिया ने घबराकर ऑंखें खोली । उसने देखा कि उसका मालिक उसके बिस्तर पर उसके बगल में लेटा हुआ है । वह चिल्लाने ही वाली थी कि तभी उसके मालिक ने अपना हाथ उसके मुॅंह पर रख दिया । रमिया के कानों में मालिक द्वारा कहें शब्दों की फुसफुसाहट होने लगी । उसका मालिक उसे चुपचाप खुश करने के लिए कह रहा था । उसका कहना था कि उसकी पत्नी अभी कुछ दिनों तक पत्नी धर्म निभाने में सक्षम नहीं है इसलिए वह आज से ही उसकी पत्नी की जगह ले और उसे रोज खुश करती रहें ।
रमिया ने जब अपने मालिक की बात का विरोध किया तों शराब के नशे में वह अपना आपा खो बैठा और रमिया के साथ जबरदस्ती करने लगा । रमिया के चिल्लाने की आवाज़ सुनकर रमन भी नींद से जाग गया और रोने लगा । रमिया के मालिक के सिर पर वासना ने इस तरह अपना कब्जा जमा लिया था कि वह कैसे भी करके अपनी वासना की आग को बुझाना चाहता था । उसने रमिया पर दुबारा झपट्टा मारा और अपने पुरूषत्व का जोर दिखाने लगा ।
वह वहशी दरिंदा अपने मकसद में कामयाब हो जाता अगर ऐन मौके पर रमिया की मालकिन ना आई होती । उसने अपने पति को बड़ी मुश्किल से रमिया से अलग किया । अपनी पत्नी को देख कर भी रमिया के मालिक को शर्म नहीं आई । वह अपनी पत्नी को वहाॅं से जाने का बोलकर रमिया को पकड़ने ही वाला था कि तभी रमिया की मालकिन ने एक डंडा उठाया और अपने पति के सिर पर वार किया । डंडे के वार से वह बेहोश हो गया ।
रमिया की मालकिन ने उसे कुछ पैसे दिए और कहा कि वह इन दोनों की जिंदगी से दूर चली जाए । रमिया ने कहा कि वह भला इतने छोटे बच्चे को लेकर कहाॅं जाएंगी ?? कोई भी तों नहीं है उनका ?? मालकिन ने रमिया की एक ना सुनी । उसे इस हालात में रमिया की खुबसूरती डसने लगी थी और वह नहीं चाहती थी कि उसका पति रमिया से संबंध रखे । कोई भी औरत अपने पति के साथ किसी दुसरी औरत को बर्दाश्त नहीं कर सकती हैं और वह दूसरी औरत अगर रमिया की तरह खुबसूरत और जवान हो तों वह बिल्कुल भी नहीं चाहेगी ।
रमिया की खुबसूरती एक बार फिर से उसके लिए अभिशाप बन गई और उसे वह घर छोड़ना पड़ा । साढ़े तीन साल के बच्चे को लेकर रमिया दर - दर भटकने के लिए मजबूर हों गई । जब तक मालकिन द्वारा दिए गए पैसे थे तब तक तों ठीक था। उन दोनों को खाने - पीने की कमी नहीं हुई लेकिन जैसे ही कुछ महीनों बाद पैसे की कमी हुई रमिया और रतन के खाने के भी लाले पड़ने शुरू हो गए ।
देवदूत आसमान से नहीं आते इसी धरती पर बसते हैं और जरूरतमंदों की मदद के लिए अचानक सामने आ जाते हैं। ऐसे ही एक फरिश्ते की मदद पाकर रमिया की ऑंखो से अश्रुधारा बहती रहीं और दिल से सिर्फ दुआएं निकल रही थीं । यह नजारा बेहद भावुक कर देने वाला था जब एक दिन एक पच्चीस - छब्बीस साल के एक लड़के ने अपनी भूख को नजरंदाज करके अपने मुॅंह का प्रत्येक निवाला देकर रमिया और रतन की जिंदगी बचाई थी ।
रतन अब पाॅंच बरस का हों चुका है । रमिया जहाॅं भी काम माॅंगने जाती उसकी खुबसूरती उसकी राह में सर्वप्रथम रोड़े अटकाती । इंसानों की तकलीफ़ से भला कोई कैसे मुॅंह फेर सकता है ??
इन्हीं विवशता के हालात का फ़ायदा उठाकर पुरुष वर्ग मदद करने के बहाने रमिया के पास आना चाहता था ताकि अपने भीतर छुपे हुए वासना की अग्नि को तृप्त कर सकें ।
महिला वर्ग रमिया को अपने घरों में काम देने से कतराती । रमिया की खुबसूरती और मर्दों की खुबसूरती के प्रति आकर्षण का भय पत्नियों को एक संभावित खतरे की तरफ इशारा करती और वह रमिया को काम देने से मना कर देती।
रमिया और उसके बेटे रतन की जिंदगियां कष्टों व अभावों के बीच गुजर - बसर करने लगी । पेट की आग बुझा लेने एवं तन की इज्जत ढॅंक लेने के अलावा रमिया की जिंदगी का कोई मकसद नहीं था। स्थिति इतनी बदतर हो गई थी कि कूड़े के ढेर पर जिल्लत भरी जिंदगी जीने को दोनों विवश थें ।
रमिया जहाॅं अपनी गुजर-बसर कर रही थी महिलाएं एवं बच्चे सुबह होते ही भीख माॅंगने के लिए निकल पड़ती थे । टूटे-फूटे घरों में रहना , गरीबी , कुपोषण और अशिक्षा इन लोगों की नियति बन चुके थे ।
रमिया की जिंदगी भीख माॅंग कर जैसे - तैसे कट रही थी । एक दिन तों हद ही हो गई दोनों माॅं - बेटे को दो वक्त की रोटी नसीब होने के पैसे तक ना मिले ।
बेटा भूख से तड़प रहा था । गंदे पानी को अपने बेटे के मुॅंह में रख कर वह कब तक उसकी क्षुधा ( भूख ) को शांत करती ? । रमिया की छाती अपनी बेबसी और लाचारी पर आज चीत्कार उठा ।
कोई भी माॅं खुद पर चाहें लाख सितम झेल लें लेकिन अपने बच्चे को भूख से बिलखते हुए उसकी ऑंखें कभी नहीं देखना चाहती है । अपने बेटे के रोते हुए चेहरे को देख फफकती रमिया , एक हाथ से अपने ऑंसू पोंछती और अपने दूसरे हाथ से पानी पिलाकर उसे चुप कराने की कोशिश कर रही थी लेकिन भूख से बेहाल रतन चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था ।
पाॅंच साल के मासूम बच्चे के दर्द की चीख रमिया को आज तक सता रही हैं लेकिन वह क्या करती ?? वह हालातों के आगे इतनी विवश हो गई थी कि उसके पास यह करने के अलावा कोई चारा भी तो नहीं बचा था । एक माँ ने अपने ही बेटे के साथ ऐसा क्यों किया ?? यह सवाल नहीं है बल्कि एक माॅं की विवशता हैं जिसने अपनी गरीबी और हालातों से सिर्फ अपने बच्चों की भूख मिटाने के लिए दिल पर पत्थर रख लिया ।
रमिया की ऑंखो में बेबसी झलक रही थी । वक्त के सितम से हताश माॅं ने अपने ही बेटे का दाहिना हाथ कटवा दिया था और उसे विकलांग बनवा दिया ताकि बच्चा सड़कों पर भीख माॅंगने निकल पड़े और उन्हें अधिक मात्रा में भीख मिल सकें । सही अर्थों में देखा जाएं तों ऐसा करने के पीछे सिर्फ और सिर्फ एक ही वजह थी " भीख माॅंग कर पेट की क्षुधा ( भूख ) मिटाना " । एक माॅं ने एक रोटी के लिए अपनी गरिमा को दांव पर लगा दिया था ।
धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻
" गुॅंजन कमल " 💓💞💗

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