आज बारह साल बाद, मैं अपने गांव जा रहा था । मेरे पढ़ने के शौक को देखकर, बचपन में ही मां - बाबूजी ने मुझे मामा के पास शहर पढ़ने के लिए भेज दिया था । मैं ट्रेन में, अपने बचपन के गांव को याद करने की कोशिश करने लगा ।
दूर-दूर तक रेत के ऊंचे - ऊंचे टीले, कच्चे - पक्के घर, हर घर में गलीचे बनाते लोग, दूर पहाड़ी पर दिखता एक किला, जिस पर मैं अपने दोस्तों के साथ चढ़ने की कोशिश करता था ।
क्या आज भी मेरा गांव वैसा ही होगा ? सोचते - सोचते कब सफर कट गया, पता ही ना चला । जयपुर स्टेशन उतरकर, मैं बस स्टैंड पर आया और अचरोल के लिए बस ले ली । 
हां, मेरे गांव का नाम अचरोल है । जयपुर से चालीस किलोमीटर की दूरी पर ।


मैं अपने दोस्तों के घर की पहचान करते-करते, अपने घर तक पहुंचा । मां - बाबू जी से मिलकर, सब के बारे में जानकारी ली और शाम को दोस्तों से मिलने घर से निकल पड़ा ।

पन्ना को आवाज लगाई । मेरे सामने दुबला - पतला युवक बनियान और लुंगी पहने, आकर खड़ा हो गया । जिसकी गोद में बच्चा था । मैंने उसे पहचानने की कोशिश करते हुए कहा, "पन्ना, पहचाना मुझे, मैं देवा ।"
वह थोड़ा सा झेंप गया और बोला, "अरे देवा, तू तो साहब लग रहा है ।"
मैंने कहा, "चल, सब दोस्तों को बुलाते हैं । पहले की तरह मस्ती करेंगे ।"
वह बोला, "अरे देवा, पुराने दिन अब लौट कर नहीं आएंगे । मैं तीन बच्चों को लेकर, कहां घूमने जा पाऊंगा ?"
मैं हैरान होते हुए बोला, "तेरे तीन बच्चे हैं ?"
वह बोला, "हां, अब बच्चों से और काम - धंधे से किसी को भी फुर्सत नहीं है । कोई नहीं जाएगा, तेरे साथ मस्ती 
करने  ।"
मैंने उदास होते हुए कहा, "ठीक है यार, तू संभाल बच्चों को, मैं अकेला ही गांव घूम लूंगा ।"

मैं वहां से आगे चला । अब गांव में बहुत कम टीले बचे थे । चारों तरफ घर ही घर नजर आ रहे थे ।
आगे बढ़ा, तो देखा एक लड़की कुछ बच्चों को पढ़ा रही 
थी । मैं रुक कर उस लड़की को पहचानने की कोशिश करने लगा । उसने भी मुझे देख लिया लेकिन वह बच्चों को पढ़ाती रही । मैं वहीं पास में पेड़ के नीचे खड़ा हो गया । वह मुझे देखी हुई सी लग रही थी । सभी बच्चे उठ - उठ कर जाने लगे । 

वह मेरे पास आई और बोली, "देवा राम मणुवेर, क्या बात है ? पहचानने की कोशिश कर रहे हो ?"

मैं चौंक गया । वह तो मेरा पूरा नाम जानती थी ।

मैंने थोड़ा हिचकते हुए कहा, "कहीं तुम राधा तो नहीं ?"

वह बोली, "देर से ही सही, लेकिन ठीक पहचाना ।"

मैंने कहा, "तुमने, मुझे इतनी जल्दी कैसे पहचान लिया ?"

"तुम्हारे जैसा यहां और कोई नहीं, देवा राम मणुवेर । शहर में तो गांव का एक ही लड़का गया था, जो अब लौटा है ।"

"हां, और अब फिर शहर चला जाऊंगा । वहीं नौकरी भी मिल गई है । मैं पहले, थोड़े दिन गांव में रहना चाहता था इसीलिए आ गया ।"

"ठीक किया, देवा राम मणुवेर । जाओ शहर । नमस्ते ।"

"अरे, तुम मेरा पूरा नाम क्यों ले रही हो ? इतनी बेरुखी से बात क्यों कर रही हो ? मैं इतने सालों बाद गांव आया हूं, वैसे ही मुझे यहां कुछ ज्यादा अच्छा नहीं लग रहा ।"

राधा बोली, "क्यों लगेगा अच्छा ? अच्छाई वाली कोई बात तो यहां हुई नहीं है ।"

मैंने चौंकते हुए पूछा, "क्या मतलब ?"

"देवा राम मणुवेर, जरा अच्छी तरह आंख खोल कर देखो । तुम शहर से पढ़ - लिख कर आए हो, पर गांव में कोई अच्छा स्कूल तक नहीं है । लोगों को शिक्षा का महत्व तक नहीं पता । पहले, हर घर में गलीचे बनते थे । लोगों के घर में ही रोजगार था । घर की औरतें भी सुबह - शाम गलीचे बनाकर पैसे कमा लेती थी । आज किसी भी घर में गलीचा नहीं बनाया जाता । क्योंकि यहां के दबंग और नेता लोगों ने सब अपने हाथ में ले लिया । अब गांव वाले, जयपुर जाकर गलीचा बेचने की बजाय, ओने - पौने दामों में इन्हें ही बेचने पर मजबूर हैं । यही लोग गलीचे बनाने की ऊन, गांव वालों को महंगें दामों में बेचकर, दोहरा मुनाफा कमाते हैं ।धीरे-धीरे यह काम सब ने बंद कर दिया । गांव का सरपंच, सालों से एक ही परिवार से बनता आ रहा है । जो गांव की भलाई के लिए आने वाला सरकारी पैसा हड़प जाता है । शहर कर रहे होंगे तरक्की, लेकिन हमारा गांव पहले से ज्यादा पिछड़ गया है ।"

राधा की बात सुनकर मुझे धक्का लगा । मैं कुछ कह नहीं पाया और अपने घर की तरफ चल पड़ा । अब मैं गांव को देख रहा था, राधा की नजरों से । घर आते - आते मैंने निश्चय कर लिया ।

अगले दिन शाम को राधा दनदनाती  हुई मेरे पास आई ।
वह गुस्से से बोली, "देवा राम मणुुवेर, मैंने तुम्हें कहा था, गांव को अच्छी तरह आंख खोल कर देखो और तुम्हें पूरे गांव में, मैं ही दिखी । जो मेरे घर शादी का संदेश भेज
दिया ।"

मैंने गंभीरता से कहा, "राधा, जो रास्ता तुमने मुझे दिखाया है, उस पर चलने में क्या तुम मेरा साथ नहीं दोगी ?"

वह प्रश्न - सूचक निगाहों से बोली, "क्या मतलब ?"

"राधा, गांव तुम्हारी रग-रग में बसा है । तुम जानती हो, यहां की क्या समस्या है और क्या समाधान है । हम दोनों मिलकर गांव की भलाई करेंगे । मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं ।  
मुझे तुमसे अच्छा जीवन साथी नहीं मिलेगा । जो मुझे सही रहा दिखाएं । जब भी मैं कुछ गलत करूं तो तुम कहना, देवा राम मणुवेर ।"

वह अभी भी हैरत में थी मैंने आगे कहा ।
"यह सब मैं अकेले नहीं कर पाऊंगा । मुझे तुम्हारा साथ चाहिए । कोई जल्दी नहीं है, तुम सोच कर जवाब दे सकती हो ।"

राधा मेरे करीब आई और आंखों में देखते हुए बोली,
"देवा, सही कार्य के लिए निर्णय लेने में, मैं देर नहीं 
करती । कल का सूरज हमारे गांव के लिए खुशहाली का सवेरा लाएगा ।"