"हमारी शादी को चार साल हो गए हैं और हम कभी बाहर घूमने नहीं गए । अब तो सना भी दो साल की हो गई है ।" 
रिया ने अपने पति गौतम से शिकायत करते हुए कहा ।
"अरे देवी जी, इसीलिए तो कह रहा हूं, सना अभी छोटी है । सफर में यह परेशान हो जाएगी और साथ में हम भी ।"
गौतम ने अपना बचाव करते हुए कहा ।
"हां - हां, अभी कहो सना छोटी है, फिर कहना अभी स्कूल जा रही है, आगे कहना बोर्ड के एग्जाम है, फिर कहना.."
"अरे - अरे, ब्रेक लगाओ ब्रेक लगाओ, कहां तक पहुंच गई तुम ? चलो ठीक है । बताओ कहां जाना है तुम्हें ?"
गौतम ने हथियार डालते हुए कहा ।
रिया खुश होते हुए बोली, "मुझे वैष्णो देवी जाना है । मैं वहां कभी नहीं गई ।"
गौतम ने कुछ सोचते हुए कहा, "वैष्णो देवी जाने के लिए हमारी सना वाकई बहुत छोटी है । खैर, जब तुम्हारा इतना ही मन है तो चलो चलते हैं । जो होगा देखा जाएगा । मैं ट्रेन में रिजर्वेशन करा लेता हूं ।"

शाम को गौतम ने रिया को बताया, "मेरा दोस्त विजय, उसकी पत्नी अंजू और बेटी साक्षी भी हमारे साथ चलेंगे ।"
रिया बोली, "चलो अच्छा हुआ साक्षी के साथ सना खुश  रहेगी ।"
गौतम बोला, "हमें आठ तारीख को झेलम से जाना है, तुम तैयारी कर लो ।"

वैष्णो देवी पहुंच कर रिया सबसे ज्यादा खुश थी । सना भी साक्षी के साथ यहां-वहां दौड़ लगा रही थी ।
नहा - धोकर शाम को सब वैष्णो देवी की चढ़ाई के लिए निकले ।

गौतम बोला, "रिया, हमें बैग और सना को गोद में लेने के लिए पिट्ठू कर लेना चाहिए ।"
रिया बोली, "मैं सना को किसी जानवर पर अकेले नहीं बिठाऊंगी ।"
रिया की बात सुनकर सब हंसने लगे । गौतम हंसते हुए बोला, "पिट्ठू कोई जानवर नहीं, इंसान होता है । जो हमारे सामान और बच्चों को गोद में लेकर साथ-साथ चलता है ।"
रिया झेंपती हुई बोली, "मुझे क्या पता, मैं तो यहां पहली बार आई हूं ।"

गौतम ने राजू नाम के एक व्यक्ति को बैग दे दिया और सना को गोद में दिया । लेकिन सना मचल गई । वह खुद ही चलना चाहती थी । सब सना के उत्साह को देखकर खुश हो रहे थे । साक्षी आगे - आगे दौड़ने लगी, पीछे - पीछे सना ।

चलते चलते रात हो गई रिया बोली, "कब तक चलते रहेंगे ? मंदिर कब आएगा ?"
गौतम ने हंसते हुए कहा, "अभी तो चढ़ाई शुरू ही हुई है, सुबह तक पहुंचेंगे ।"
रिया हैरान होते हुए बोली, "इतना चलना पड़ता है, मुझे नहीं पता था । खैर, अच्छा लग रहा है चलना तो । लेकिन कुछ ज्यादा ही हो गया है ।"

सना गौतम की गोद में सो गई । गौतम ने सना को राजू की गोद में दे दिया जो बैग लिए साथ-साथ चल रहा था । सना की आंख खुल गई । अपने आप को किसी अजनबी की गोद में देखकर वह जोर - जोर से रोने लगी । गौतम ने जल्दी से सना को लेकर चुप कराया और उसे सुला दिया । फिर धीरे से राजू की गोद में दिया लेकिन सना फिर से उठ कर रोने लगी । पूरी रात यही क्रम चलता रहा ।

सुबह नहा - धोकर माता के दर्शन किए और भैरव की चढ़ाई के लिए खच्चर पर बैठ गए । 
विजय बोला, "तुम्हें लग रहा है खच्चर पर बैठकर चलना आसान है । तुम्हें अभी पता चल जाएगा ।"
रिया बोली, "एक नया अनुभव मिलेगा । खच्चर पर बैठना तो बनता है ।"
सभी अपने - अपने खच्चर पर बैठ गए । सना को रिया अपने साथ लेकर बैठी । जैसे ही खच्चर आगे बढ़ा सभी को डर लगने लगा । छोटे-छोटे घुमावदार रास्तों पर खच्चर तेजी से चल रहा था । आसपास का सौंदर्य देखते ही बनता था । रिया वहां के मनोरम दृश्य में खो सी गई थी । वापसी में सभी सांझी छत तक खच्चर पर आए । सब के पैरों का बुरा हाल था ।

रिया बोली, "भई खच्चर पर तो शरीर ज्यादा परेशान हो गया । अब पैदल ही चलेंगे । सब हंसते - बतियाते चलने लगे ।
अचानक अंजू बोली, "साक्षी कहां है ?"
सब इधर-उधर देखने लगे । साक्षी नजर नहीं आई । सब हैरान - परेशान हो गए कि साक्षी आगे निकल गई या पीछे छूट गई । कुछ समझ नहीं आ रहा था । अंजू रोने लगी ।

विजय बोला, "अरे, रोने की क्या बात है, माता के दरबार में आई हो । हौंसला रखो । अभी मिल जाएगी । ज्यादा दूर नहीं गई होगी ।"
गौतम बोला, "विजय, हम दोनों तेजी से आगे चलते हैं शायद साक्षी आगे निकल गई हो और अंजू, रिया यहीं रुक जाएंगे । अगर साक्षी पीछे रह गई होगी तो यह दोनों उसे यहीं मिल जाएंगी । 
गौतम और विजय बाणगंगा की तरफ चले गए । रिया अंजू को हौसला दे रही थी । 
तभी एक पुलिस वाले को देखकर अंजू बोली, "सर, मेरी दस साल की बेटी नहीं मिल रही । आप कुछ मदद कर सकते हैं ?" 
वह बोला, "मैडम, डरने की कोई बात नहीं । यहां कोई गुम नहीं होता । आने - जाने का एक ही रास्ता है । वह या तो पीछे रह गई या आगे निकल गई होगी ।"
तभी अंजू का फोन बजा । एक अनजानी आवाज के बाद साक्षी की आवाज आई, "मम्मी, मैं इन अंकल आंटी के साथ हूं  "
अंजू बोली, "साक्षी मेरी बात आंटी से करवाओ ।"
एक अजनबी आवाज आई, "आप चिंता ना करें । आपकी बेटी हमारे साथ है । यह हमें रोते हुए मिली । पूछने पर आपका नंबर बताया । अभी हम माता के मंदिर से नीचे की तरफ ही आ रहे हैं ।"
अंजू की जान में जान आई । वह बोली, "जी, हम यहीं आपका इंतजार कर रहे हैं । आप जल्दी नीचे आइए ।"

अंजू ने विजय को फोन करके बताया, "साक्षी मिल गई, हम थोड़ी देर में साक्षी को लेकर आपके पास पहुंचते हैं ।"

अंजू से इंतजार नहीं हो रहा था । वह रिया से बोली, "पता नहीं वे लोग साक्षी को लेकर कब तक नीचे आएंगे । मैं ही ऊपर जाकर साक्षी को ले आती हूं ।"
रिया बोली, "अरे इतनी थकी हो । दोबारा ऊपर चढ़ना आसान नहीं है । यहीं बैठ कर इंतजार करते हैं । वे आएंगे तो नीचे ही ।"
लेकिन अंजू नहीं मानी । रिया और सना को वहीं छोड़कर अंजू साक्षी को लेने वापस चढ़ाई करने लगी ।
थोड़ी देर में अंजू और साक्षी नीचे उतरते हुए नजर आए ।

सभी बाण गंगा पर मिले । सब थके हुए थे । लेकिन सबके चेहरे पर सुकून था । सबसे ज्यादा खुश रिया थी । 

रिया बोली, "मैंने वैष्णो देवी का बस नाम ही सुना था । और लोगों के चेहरे की खुशी देखी थी । मुझे नहीं पता था, यह जगह इतनी सुंदर है और यहां इतना चलना पड़ता है ।" गौतम बोला, "अब दोबारा कभी आओगी यहां पर ?"
रिया तपाक से बोली, "हां, क्यों नहीं ? जरूर आऊंगी । लेकिन सना के बड़े होने पर ।" 
सब खिलखिला कर हंसने लगे ।