ओ कन्हैया तुमसे मन की 
बात मैं कहना चाहूँ
न राधा,न रुक्मणी, 
मैं मीरा बनना चाहूँ

देह हैं दो पर एक है प्राण
राधा बिन पूर्ण न कृष्ण का नाम
फिर भी झेली विरह वेदना
प्रेम का यह कैसा परिणाम

कुछ न चाहूँ मोहन
बस मैं साथ तुम्हारा चाहूँ
न राधा, न रुक्मणी,
मैं मीरा बनना चाहूँ

देवी रुक्मणी कृष्ण की पत्नी
पर हृदय में तो राधा ही बसती
स्त्री के मन से पूछो जिसके
पति के हिय में छवि और की

कुछ न चाहूँ नाथ मैं,
बस मन में बसेरा चाहूँ
न राधा, न रुक्मणी,
मैं मीरा बनना चाहूँ

सबसे निर्मल मीरा की भक्ति
न खोने, न पाने की आसक्ति
स्वयं को करके कृष्ण को अर्पण
हर मोह से पाई जिसने विरक्ति

तेरे प्रेम में ओ गिरिधर!
मैं जोगन बनना चाहूँ
न राधा, न रुक्मणी,
मैं मीरा बनना चाहूँ  

✍️प्रीति ताम्रकार
      जबलपुर