फंसा हुआ हूं शब्दों के मायाजाल में
मोक्ष मुक्ति की अब चाह नहीं
दुनिया की मुझे परवाह नहीं।।
शब्दों की मायानगरी में
थरकती मनमोहिनी सुंदर अप्सराएं
शब्दों की खटपट कातिल अदाएं
जैसे छाई हो नभ में काली घटाएं
जैसे चलती हो शीतल हवाएं
शब्दों से महकी हो जैसे सारी दिशाएं
खोया हुआ हूं मैं शब्दों की लचकती मृदु चाल में
फंसा हुआ हूं शब्दों के मोह-मायाजाल में
मोक्ष मुक्ति की अब चाह नहीं
दुनिया की मुझे परवाह नहीं।।
वो कविता बन मन मन्दिर में ऐसे बसी है
जैसे फूलों में हो महकता पराग
अंधेरे में हो रोशन चिराग
साज में हो मधुर राग
अनासक्त मन में छाया हो जैसे अनुराग
उलझा हुआ हूं कविता के कजरारे दृक बिंदू विशाल में
फंसा हुआ हूं शब्दों के मोह-मायाजाल में
मोक्ष मुक्ति की अब चाह नहीं
दुनिया की मुझे परवाह नहीं।।
मैं रस का प्यासा भंवरा जन्म जन्म का
रस का आदि मैं वन उपवन उपवन का
हूं दिवाना मैं खिली कलि कलि का
चूसकर रस हृदय आंगन में रस का अथाह भंडार भरूं शब्द मकरंद की चाह में मदमस्त हाथी सा झूमता फिरूं
गुंजार करूं डाली डाली प्रेम विरह के सम्मान में
भटका हुआ हूं शब्द मोती की टकसाल में
फंसा हुआ हूं शब्दों के मोह-मायाजाल में
मोक्ष मुक्ति की अब चाह नहीं
दुनिया की मुझे परवाह नहीं।।
पिंटू कुमावत'श्याम दिवाना'🙏🙏 💐💐

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