स्वर्ण अक्षर में किर्ति बखान,
महाकवि की काव्य महान.....
सुन्दर भाव,कमलतन् नूतन,
"कालिदास" था उनका यह नाम.....
उनका चरित्र मैं तुम्हें सुनाऊँ,
थे वो 'मुर्ख' की पोथी बताऊँ.....
जिस डाली पर बैठे थे वो,
लिया कुल्हाड़ी उसे गिराऊँ.....
"मंदबुद्धि" प्रचलित नाम पड़ा था,
उनसे सब'परिहास' करे.....
एक बार जो हाथ लगे फिर,
उसका ही केवल नाम जपे.....
लोगों ने मिलकर सादी करवा दी,
"विद्योतमा" फिर पत्नी बनी.....
पता चला "मंदबुद्धि" है 'वर'
चकराकर धरातल पर गिरी.....
शादी भी 'परिहास' बन गया,
लोगों से उनको 'धुत्तकार' मिला.....
'विस्तर' फेंके,ओढ़े चटाईं
मान नहीं अपमान मिला.....
दिन बिते नहीं देर भली,
आयीं अचानक बाढ़.....
कौन जाये?? नदीं पार "सांझ" दिखाने,
भगवती लगावे पार.....
ना 'हेलन' आवे "मंदबुद्धि" को,
'उफनती' नदीं में लोगों ने भेज दिया.....
डूबते-डूबते 'कात' लगे तब,
जाकर भगवती को "सांझ" दिया.....
'मन' तब सोचे "मंदबुद्धि" ने,
सब मिलकर हमें 'किंचर' उछाले.....
'पग-चिन्ह' देने चले "काली-पोतों से,
भगवती को ही दिये लगाय.....
'भगवती' अचानक प्रगट भई,
रोके हाथ "कालिदास" कहीं.....
हुआ प्रसन्न मैं आज तुमपर,
मांग 'वरदान' तू हमें बता.....
यदि प्रसन्न हो 'माँ भगवती' तू मुझसे.....
बस तू मेरा भाग्य जगा.....
कोई कहें ना "मंदबुद्धि" अब,
इसका ही उपाय बता.....
"भगवती" बतायी गुंड़ रहस्य तब,
जाकर तू पूरा 'पोथी' उल्टा.....
आज जितना पन्ना उलटाऐगा तू,
'कलंक' "मंदबुद्धि" का धूल जायेगा.....
बने महाकवि "कालिदास" महान,
यहीं था उनका चरित्र गुनगान.....
लेखक:- विकास कुमार लाभ
मधुबनी(बिहार)

0 टिप्पणियाँ