1981  की बात है जब हमारे गाँव के लोग खाने के लिए दाने-दाने को मोहताज थे। खाने के नाम पर मरुआ के रोटी ,सामा के चावल और सकरकंद था।हालाकि ये सब भी थीक से नसीब नहीं हो पाता था। लेकिन किसी प्रकार गाँव के लोगों का जीवन यापन चल रहा था। 
                                               इसी समय की अवधि में मेरे घर के प्लाॅट के पीछे वाले पलाॅट मे जिनका घर था। वे बहुत धनी थे,और इसी का फायदा उठाए।लेकिन उस समय जमीन का उतना महत्व नही था जीतना की अभी है। उस समय कोई किसी को दो-चार वक्त की खर्ची चला दे,तो वो उसे एक-दो कट्ठा जमीन लिख दिया करता था।आप अनुमान लगा सकते है कि उस समय की स्थिति कैसी थी। हमारे घर के पीछे वाले आदमी के परिवार में कई लोग थे। उस आदमी जो उस घर के मुखिया था  उसका नाम तो नहीं लेते पर इस कहानी  को पूरा करने के लिए मान लिया कि उसका नाम दशरथ चौधरी  था तथा उसके पत्नी का नाम राज रतन देवी था। उन्हें दो बेटा और पांच बेटी थी।  बेटियों की शादी यथासंभव घर में कीए हुए थे।और दोनों बेटों को भी शादी हो गई एक का नाम मान लिया की लक्ष्मण और उनकी पत्नी का नाम उर्मिला थे और दूसरे बेटा का नाम मान लिया कि देवेंद्र और उसकी पत्नी का नाम  प्रभावती थी।उनका परिवार बड़े  सुख में व्यतीत कर रहा था परंतु मन की ईर्ष्या किसकी होती है जो उनकी होगी। 
                              और उस समय हमारे परिवार में सिर्फ चाचा चाची और मेरे पिताजी रहा करते थे हमारे पिताजी यहां नहीं रहा करते थे वह पंजाब रहते थे । हमारे चाचा जी सीधा दिल के आदमी थे। और यही बात का फायदा दशरथ चौधरी और उनके बड़े बेटे ने उठाया । दशरथ चौधरी का घर हमारे घर के प्लॉट के पीछे वाले प्लॉट में था उनके घर जाने के लिए कोई रास्ता नहीं था सिवाय मेरे घर के प्लाट से जाने के। उन्होंने सोचा  कि क्यों ना हमारे घर तक भी रास्ता हो।और इस रास्ते  को बनाने के लिए  उन्होंने हमारे चाचा जी को  बड़ी ही चालाकी से मूर्ख बनाया उनहोंने मेरे चाचा जी को सीखाया कि यहां पर एक शिव मंदिर बना दिया जाए । मेरे चाचा जी  तो ठहरे सीधा दिल के आदमी ,वह मान भी गए  पर उन्हें कहां मालूम था की यह शिव मंदिर तो एक बहाना है  उन्हें मुख्य सड़क से उनके घर के रास्ता ले जाने का । हमारे चाचा को हामी भरते देर ना हुई कि मंदिर बनाने  का घोषणा पूरे गांव में हो गया। आखिर हो भी क्यों नहीं उनके लिए जश्न का दिन था घर तक जाने के लिए परमानेंट रास्ता जो मिल गया। उनके लिए तो वही बात थी जैसे सोने में सुहागा। जब गांव में घोषणा हो ही गई तो लगे हाथ मंदिर निर्माण का कार्य शुरू हो गया मंदिर निर्माण होने लगा तब दशरथ चौधरी के मन में  लोभ और बढ़ गया उनका मन था कि प्लॉट के पूर्वी भाग   ही  नहीं  बल्कि पूरा  प्लांट ही छोड़ दो लेकिन इस बार हमारे चाचा जी उनके झांसे में नहीं आए वह कहें की यदि  पूरा प्लॉट आपको दे देता हूं तो  मेरे बाल बच्चे होंगे वे कहां रहेंगे और अभी हमारे भाई की शादी भी नहीं हुई है कल उसका भी शादी हो जाए और उसके भी बाल बच्चे हो तो वह कहां रहेंगे। दशरथ चौधरी उनके बड़ा बेटा मेरे चाचा जी को एक जवाब देते हैं  वे  कहते हैं की यदि तुम घर के पास वाले दूसरे जमीन में घर बनाना चाहते हो तो मैं वहां बना दूंगा लेकिन तुम्हें इसे छोड़ना होगा लेकिन मेरे चाचा जी इस  लोभ में भी नहीं   परे।    वह कहें   ऐसा नहीं होगा मैं आपको  इस  प्लॉट  के पूर्वी भाग दे चुका हूं और आप को उस भाग में ही मंदिर निर्माण करना होगा। मंदिर निर्माण होना शुरू हो गया और मंदिर निर्माण कार्य सन 1981 के अंतिम तक संपन्न हो गया और 1981 से 1982 तक उसमें भगवान भोलेनाथ के सपरिवार मूर्ति स्थापित हो गया। स्थापित हुए भगवान भोलेनाथ का नामकरण भी किया गया इसमें उन्हें कमलेश्वर नाथ महादेव के नाम  दिया गया । धीरे धीरे समय बीत गया इसी बीच में बहुत कुछ बदल गया था । 
                                                   जब हमारा बाल अवस्था था और अभी तक मैंने उस मंदिर में थोड़ा बहुत बदलाव देखा है। यह मंदिर तो वही है जो पुराना था उसमें थोड़ा परिवर्तन हुआ कि जब शिवलिंग स्थापित हुआ था  तब भूतल से  एक   फीट नीचे  स्थापित किया गया था। लेकिन उसे 2010 मैं आए महाशिवरात्रि मैं ऊपर कर  पुन: स्थापित किया गया और हर साल महाशिवरात्रि के पर्व पर वह लोग अपना पूजा करवाते थे। समय बीतता गया दशरथ चौधरी और उनका  बड़ा बेटा का देहांत हो गया । अब तो जो भी करना था दशरथ चौधरी के छोटे लड़का को ही करना था ।  

स्वरचित एवं मौलिक
 सुशील चौधरी 
जंदाहा वैशाली बिहार