कर्म योगी के कांधे से,
कर्तव्यों का बोझ कब टला है !
अधिकार लेने आ गए सब ,
कर्तव्य पथ अकेला चला है !
उष्णता होती है
भानु की रश्मियों में ,
कर्मठता होती है ,
कर्म योगियों की धमनियों में !
चलता हुआ कर्तव्य पथ पर ,
आघात जितना तन पला है ,
एक दिन लोहे की भांति ,
फौलाद बनकर वह ढला है !
रक्त एक ही दौड़ता था ,
रावन विभीषण के रगों में ,
अक्सर विभेद देखा गया है ,
रक्त सम्बन्धी सगो में !
कर्तव्य पथ पर अपार चुनौती ,
हर पग मिला है ,
तपकर अग्नि में भी ,
सोना कब जला है !
अधिकारी लेने आ गए सब,
कर्तव्य पथ अकेला चला है !
.......✍️ पिंकी मिश्रा
भागलपुर बिहार

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