कृष्ण के प्रेम #परिणय में,
पगी मीरा दीवानी है।
दिया तन मन कन्हैया को,
बनी #प्रेयसी वो रानी है।
सुबह से #साँझ तक लेकर,
श्याम के गीत गाती है।
#जिजीविषा मिट गई सारी,
कोई #अभिकल्प न बाकी है।
मिटा है मोह जीवन से,
जो #क्षणभंगुर जगत का है।
बनी बदली वो सागर की,
ज्ञान #रिमझिम बरसता है।
स्वरचित एवं मौलिक
शीला द्विवेदी "अक्षरा"

1 टिप्पणियाँ