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कपूर की भीनी सुगंध सा!
तेरा एहसास......
जज्ब हो रही, सासों के साथ!!
मुझे कर रही, पुरसुकूं,
हर लम्हा.......
इश्क तेरा, लौंग की खुशबू!
की तरह.......
दूर होकर भी, जकड़ते हुए!
सीने में समा रही,
आजवाइँन जैसे........
और मैं तेरे इश्क की पोटली!
को सूंघ कर ,
अपनी बेतरतीब सांसों ,
को काबू कर जा रही!
ख्वाबों के आगोश में..........
श्वेता कर्ण

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