हा मैं आजाद होना चाहती हूँ।
तोड़ कर कफ़स की जंजीरों को मैं खुल कर जीना चाहती हूँ।
हौसलों के पंख लगा उन्मत्त गगन में उड़ने चाहती हूँ।।
अपनी काबलियत से अपने सपने पूरा करना चाहती हूँ,
हा मैं आजाद होने चाहती हूँ।।
मायके से लेकर ससुराल तक बंधी रही अनुशासन की डोर में।
त्याग और संस्कार भी बांध दिए गए मेरे दामन के छोर में।।
बन्धन के इस पिंजरे से अब मुक्त होना चाहती हूँ,
हा मैं आजाद होने चाहती हूँ।।
पहिचान को खोया हमने अस्तित्व भी अपना मिटाया हमने।
फिर भी इस त्याग का फल कुछ भी न पाया हमने।।
अब मैं स्वयं की पहिचान बनाना चाहती हूँ,
हा मैं आजाद होना चाहती हूँ।
अपने हिस्से की खुशी, वजूद, मुट्ठी भर आसमाँ चाहती हूं।
बेखौफ होकर नही अब बेबाक होकर जीना चाहती हूँ।।
खुद से खुद को मिलाने के लिए थोड़ा वक्त चाहती हूँ,
हा मैं आजाद होने चाहती हूँ।
बेटी,बहन,बहू, पत्नी और माँ कितने ही अभिनयों को निभाया हमने।
मिटा कर अपने वजूद को खूबसूरती से हर रिश्ता सजाया है हमने।।
अबला नही अब सबला होकर जीना चाहती हूँ,
हा मैं आजाद होने चाहती हूँ।
हर सितम को सहती रही और अपने आंसू छिपाती रही।
दिल में थे अनेकों दर्द फिर भी मैं मुस्कराती रही।।
अब इंद्रधनुष जैसी जिंदगी चाहती हूँ,
हा मैं आजाद होना चाहती हूँ।।
सर्वाधिकार सुरक्षित
शीला द्विवेदी"अक्षरा"

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