"चाचू, चाचू, आपको मम्मी बुला रही है ।" पांच साल की रिशु दौड़ती हुई किशोर के पास आई ।
किशोर, रिशु को गद में उठाए हुए अपनी भाभी के पास आता है ।
"आज, ऑफिस नहीं जाना । हमें चलना है, लड़की देखने के लिए ।" भाभी ने किशोर को देखते ही कहा ।
"नहीं भाभी, हम नहीं जाएंगे । तुम ही जाओ । चार बार रिजेक्ट हो चुके हैं । अब, हम में और हिम्मत नहीं है ।"
किशोर ने झुंझुलाते हुए कहा ।
आठ साल का रिंकू, किशोर का हाथ पकड़ते हुए बोला,
"चाचू, चलो ना, चाची को देखने । मैं भी आपके साथ जाऊंगा ।"
भाभी ने दोनों बच्चों को डांट कर भगाया और किशोर से कहा, "अरे, ऐसा नहीं कहते । उन लड़कियों की किस्मत खोटी है । जो मेरे सोने जैसे देवर को मनाही कर दी ।"
"हां तुम्हारा देवर ही सोने का है, बाकी सब तो मिट्टी के हैं । नहीं भाभी, हमें अच्छा नहीं लगता । यह देखा - देखी का खेल, हमें बुरा लगता है तो उन लड़कियों को भी तो बुरा लगता होगा ना । तुम जाओ, देखो और हमारे बारे में सब सच बताना, तो ही हम कुछ सोचेंगे ।"
"अरे, ऐसा नहीं होता ना । तुम्हें कौन समझाए । चार अक्षर क्या पढ़ गए, अब हमें ही समझाने चले हो । क्या कमी है तुम में, सब कुछ तो अच्छा है । बस एक कमी के पीछे, और जिसका शादी से कोई संबंध भी नहीं है ।" भाभी ने भी उसी लहजे में जवाब दिया ।"
"नहीं भाभी, हम कुछ नहीं सुनेंगे । तुम्हारे कहने से, हम वह पहन लेते हैं, जो तुम दिल्ली से मंगाई थी । सब कुछ सच बताने के बाद ही हम, आगे कदम उठाएंगे ।" किशोर ने अपने जूते पहनते हुए कहा ।
"हां, हां, कर लो अपनी मर्जी, मांजी को हम क्या मुंह दिखाएंगे । छोटे से तुमको, हमें देकर गई थी । आंखों में आंसू भर कर बोली थी, बहू, इसे देवर नहीं, बेटा मानियों, इसका ख्याल रखियो । आज तुम, इत्ते बड़े हो गए हो । अपने बारे में खुद सोच सकते हो । हमारी क्या जरूरत है ।"
भाभी ने आंसू बहाते हुए कहा ।
किशोर, भाभी के पास बैठता हुआ बोला, "भाभी ऐसा ना कहो ।"
भाभी ने आगे कहा, "अरे, एक बार शादी हो जाए । तुम्हारे प्यार और सम्मान को देखेगी तो तुम्हारी कमी उसे नजर भी ना आएगी । हम, औरत जात को अच्छी तरह जानती हैं । वह अपना घर, अपना पति कभी नहीं छोड़ती ।"
"भाभी, तुम औरत जात को जानती होगी । पर, मैं तो बस तुम्हें जानता हूं । हो सकता है, वह मुझे तो प्यार, सम्मान दे दे । पर इस धोखे का जिम्मेदार वह, तुम्हें मान लेगी, तुम्हें मान - सम्मान ना दे पाएगी । जो हमसे बर्दाश्त ना होगा ।"
भाभी ने आंख बड़ी करते हुए कहा, "अरे वाह, हमारे लिए तो बहुत बड़ा सोचते हो । यह नहीं समझते, तुम्हारी उम्र निकली जा रही है । हमारा बस चलता तो दो साल पहले ही देवरानी ले आते और अभी तक तो दो-चार बालक भी हो जाते ।"
किशोर ने हैरान होते हुए कहा, "भाभी, कैसी बातें करती हो, दो साल में दो - चार बालक, कुछ तो ख्याल करो ।"
"हां, हां ठीक है, अपनी पढ़ाई हमें ना सिखाओ ।" भाभी बोली ।
"ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्जी, लेकिन उन्हें, मेरे बारे में सब सच बता देना । और मुझे लड़की का फोन नंबर भी ला कर देना ।" किशोर ने भाभी के आगे हार मानते हुए कहा ।
भाभी बड़बड़ाई, "दोनों भैया सोचते हैं, हम अलादीन का चिराग है । जो सब कर लेंगे । वह कहते हैं, तुम्हारा देवर जो मर्जी चाहे करो । देवर कहता है, तुम्हारे देवरानी जो चाहे करो ।"
दो दिन बाद किशोर को नंबर देते हुए भाभी ने कहा, "हमने उनको, सब सच बता दिया । तुम्हारी फोटो भी दे दी और यह रही जयंती की फोटो । तुम, उससे दोपहर में तीन बजे से चार बजे के बीच में ही बात करना ।"
"क्या, भाभी तुम सच कह रही हो ?" किशोर ने खुश होते हुए कहा ।
"तो क्या मैं झूठ बोल रही हूं ?" भाभी ने तुनक कर कहा और वहां से चली गई ।
अगले दिन किशोर ने जयंती से फोन पर बात की । उसकी बातें सुनकर, वह बहुत खुश हुआ कि आखिर ऐसी लड़की मिल ही गई । जो उसे, इस रूप में स्वीकार करने को तैयार है ।
एक दिन
किशोर अपने दोस्त की शादी में गया । शादी में जयंती भी थी । दोनों ने एक - दूसरे को पहचान लिया ।
दोनों बातें करते हैं । किशोर कहता है, "तुम्हारी आवाज फोन पर बिल्कुल अलग लगती है ।"
"मेरी आवाज आपने कब सुनी ?"
"मैंने एक दिन तुम्हें फोन किया तो था ।"
"तुम मजाक कर रहे हो । मैंने, तुमसे कभी भी फोन पर बात नहीं की ।"
"ओ हो, अब समझ आया । यह सब मेरी भाभी का खेल
है । मेरी भाभी बहुत अच्छी है । तुम जानती हो, वह मेरे लिए कुछ भी कर सकती है । उन्होंने, तुम्हारे नाम से मुझसे फोन पर बात की, ताकि मेरी शादी हो जाए ।"
"जी, मैं कुछ समझी नहीं ?" जयंती ने आश्चर्य से कहा ।
किशोर ने कहा, "मैं, तुम्हें कुछ बताना चाहता हूं, नहीं मैं कुछ दिखाना चाहता हूं ।"
यह कहकर किशोर ने अपने सिर से विग उतार दिया । जयंती ने किशोर के गंजे सिर को देखा, जिस पर बहुत ही कम बाल थे ।
किशोर ने कहा, "मैंने, भाभी से कहा था कि तुम्हें सब सच बता दे ।"
जयंती मुस्कुराते हुए बोली, "शादी के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है, एक - दूसरे के लिए विश्वास, प्यार और सम्मान । जिसे हम पीछे कर, शारीरिक सुंदरता को सब कुछ मानकर, अपना सुकून खो देते हैं । तुम्हारी सच्चाई और मासूमियत से मुझे मोहब्बत हो गई है ।"
जयंती ने किशोर की आंखों में देखते हुए कहा, "मैं मन की सुंदरता में विश्वास करती हूं । जिस परिवार में एक - दूसरे के लिए इतना प्यार है । उस घर में मुझे भी भरपूर प्यार और सम्मान मिलेगा, और यही मैं चाहती हूं ।"
किशोर मुस्कुराया । जयंती ने किशोर का हाथ पकड़ते हुए कहा, "मैं तुम्हारे परिवार का हिस्सा बनना चाहती हूं । मुझे कब अपनी भाभी की देवरानी बनाओगे ?"

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