किसी लड़की के लिये उसके मायके का क्या महत्व है। सच पूछो तो यदि ईश्वर भी आकर उससे वरदान मांगने को बोलें तो वह अपने मायके की खुशियां ही मांगेगी। मायका उसके लिये स्वर्ग का पर्यायवाची है। मायके रूपी स्वर्ग जाने का कोई भी मौका कोई भी स्त्री नहीं छोड़ना चाहती है। मायके में कुछ दिन गुजारने से ही मन को ताजगी मिल जाती है। फिर उस ताजे मन से स्त्री अपने कर्तव्य पथ पर बढ लेती है।
मेरे याददाश्त की बात है। एक दिन मम्मी अपने मायके यानि मेरी ननिहाल जाने को मचल उठी।
" थोड़े दिन बाद चली जाना। अभी घर पर भी कुछ काम हैं। " पापा ने उत्तर दिया।
मम्मी ने कहा तो कुछ नहीं। पर उदास हो गयीं। पापा समझ गये।
" अच्छा घूम आओ। पर जल्दी आ जाना।"
मम्मी की उदासी दूर हुई।
समय आगे बढ गया। उसी घटना को बार बार देखती हूं। बस पात्र बदल गये। पापा की जगह पूज्य ससुर जी ने ले ली है। मम्मी की जगह सासू मम्मी ने ले ली है। सासू मम्मी भी छह सात महीने बाद तरोताजा होने अपने मायके जरूर जाती हैं।
" कम्मो। तुम्हें अपनी तो पड़ी रहती है। कभी नहीं सोचती कि बहू भी तो किसी की बेटी है। उसका भी तो मायके जाने का मन करता है।"
वैसे सासू मम्मी की इसमें कोई गलती नहीं है। वह मुझसे बहुत प्रेम करती हैं। मुझसे कई बार मायके जाने के विषय में पूछ चुकी हैं। पर मैं ही मना कर देती थी। पर जब ससुर जी ने उन्हें उलाहना दिया तो सासू मम्मी का भी पारा चढ गया।
" सुन सुम्मी। इसी इतबार तू मायके जायेगी। संतोष को कह देती हूं। पांच छह दिन रहकर आना।"
अब मैं सासू मम्मी को कैसे समझाऊं। मायका तो मुझे भी दूसरी स्त्रियों की भांति पसंद है। पर मैं क्यों मायके से दूर भागती हूं। मायके से या पुरानी यादों से।
...................
मैं अपने पति संतोष के साथ अपने मायके जा रही हूं। गर्मियों में बस का सफर वैसे भी कष्ट भरा होता है। पर मध्यम वर्गीय लोगों को कष्ट सहन करने की आदत होती है। वैसे विवाह के बाद मैं गाड़ी से मायके आयी थी। उस समय भी सासू मम्मी का विचार यही था कि मुझे मायके में कुछ दिन छोड़ आयेंगे। फिर विदा कराने जायेंगें। पर मेने ही उल्टावार आने पर जोर दिया। इस बार कुछ दिन मायके में रहना होगा। मेने अपने पति को उतने दिन साथ रहने के लिये मना लिया। हालांकि उन्हें छुट्टियां मिलने में थोड़ी दिक्कत हुई। पर मेने भी जिद ठान रखी थी कि रहूंगी तो उनके साथ ही। नहीं तो नहीं जाऊंगी। अब इस घर की अकेली बहू हूं। फिर मेरी बातों से पति प्रेम ही झलक रहा था। वैसे भी शादी के बाद पहली बार मायके रहने जा रही हूं। इन सब बातों से मेरा पलड़ा भारी हो गया। मेरे पति को लंबी छुट्टियां लेनी पड़ीं। मुझे पुरानी यादों से दूर होने का बहाना मिल गया। जब साथ में पति परमेश्वर हैं तो भला दिमाग उधर क्यों भटकेगा।
गांव के भागों में बस में सफर करने का अलग ही अनुभव है। अपने नम्बर पर प्राइवेट बस चलती हैं। जब सारी सीटें भर जाती हैं, कुछ जबान लड़के छत तक बैठ जाते हैं तब बस चलना शुरू करती है। बहुत धीमी गति से। जैसे बस नहीं बल्कि नवविवाहिता स्त्री हो। गड्ढों में हिलते हुए, मानों कि एक सुंदरी अपनी कमर हिलाकर चल रही हो। हर एक दो किलोमीटर चलकर बस का रुकना। कुछ का उतरना और कुछ का चढना। कुछ तो अपने गंतव्य पर पहुंचकर ही अपनी सीट छोड़ते हैं।
"सीट को संग लेकर जाओंगे। जी नाए कि पहले सीट छोड़के दरबज्जे पे आ जाएं।"
कंडक्टर का उनपर चिल्लाना।
पर उतरने बाले बाबा भी कम नहीं।
"अच्छा। तेरी बड़ी रेल छूटी जा रही है।"
फिर दोनों के वादविवाद में पांच मिनट और बस रुकी।
थोड़ा चली तो बस की छत पीटने की आवाज आने लगी। रुकते रुकते बस थोड़ा आगे बढ गयी। छत से उतरकर एक लड़का सुनाने लगा।
" कान बहरे हो गये हैं का। इलाज करा इन कानन को। इत्ती देर से छत बजा रहूं ऊं। और अब रोकी है।"
"अब तेई आबाज सुनबे कू नाहे बैठो।" बस बाले को भी कोई जल्दी नहीं है। यह रोज की बात है। एक घंटे का सफर दो से ढाई घंटे में तय करना। उसपर भी अहसान दिखाकर चलना - अरे। हम ही यहाँ बस चला रहे हैं। इतना डीजल मंहगा हो गया। सरकार की हिम्मत नाहे कि इन इलाकों में बस चला सके। वो तो हम यहाँ के लोगों की तकलीफ समझते हैं। तभी तो घाटा उठाकर बस चला रहे हैं।
"सरकार ने बस चलायीं थी। इन्होंने ही उन ड्राइवर और कंडक्टर को पीट दिया। फिर सरकारी बस नहीं चलीं।" मेने संतोष जी के कान में कहा। बदले में उन्होंने मुस्कराकर आंख झपका कर इशारा कर दिया। ऐसे मामलों में चुप रहना ठीक है। संतोष जी समझदार हैं।
संतोष जी ने कोल्ड-ड्रिंक की दो बोतलें खरीदीं। एक मुझे दी। गर्मी में चैन मिला। वैसे संतोष जी की यह अच्छी बात है। मेरी जरूरत समझ जाते हैं। बोलना नहीं पड़ता। बड़ी बड़ी बातें तो नहीं करते। पर छोटी छोटी बातों का ध्यान रख अपना प्रेम सिद्ध करते रहते हैं।
बस ने हमें गांव जाने के मार्ग पर उतार दिया। मुख्य सड़क से कटकर गॉव के लिये एक रास्ता जा रहा है। उसी रास्ते पर एक गांव छोड़ दूसरा गांव ही मेरा मायका है। गांव के रास्ते पर कोई साधन नहीं चलते। अगर कोई गांव का टैक्टर बगैरह कस्बे से गांव जा रहा होता तो गांव नाते राहगीरों को ले जाता। नहीं तो पैदल दो किलोमीटर का सफर तय करो।
हम दोनों पैदल चलने लगे। मेरे लिये यह बड़ी बात नहीं थी। हम गांव के रहने बालों को तो अक्सर बहुत दूरी तय करनी होती है। बचपन में इसी रास्ते से पढने आती थी। फिर साइकिल चलाना सीख लिया। पर संतोष जी कस्बे के रहने वाले। कस्बे में रहकर पढे। उन्हें इतना चलने का अभ्यास न था। थकावट दिखाई दे जाती।
" आप थक गये हैं। क्या?"
" अरे नहीं। ऐसी कोई बात नहीं।" संतोष जी खुद को कमजोर दिखाना नहीं चाहते। चुपचाप चलते रहे।
" अब पता चला होगा कि गांव की लड़की से शादी करके कितनी परेशानी होती है। आपके लिये तो शहरों से भी रिश्ते आ रहे होंगें।" रास्ता बड़ा था। बात करते हुए कट जायेगा।
" हाॅ। आये तो थे। कुछ लड़कियों से मिला भी। पर बात नहीं बनी।"
" अरे ऐसा क्या हुआ।"
" कुछ नहीं। जो सादगी और निश्छलता तलाश रहा था, वह नहीं मिली। खोज तुमपर जाकर पूरी हुई। अब कमल को पाने के लिये थोड़ी मेहनत को करनी होती है। थोड़ा पानी में भी उतरना होता है। कीचड़ में भी पैर घुसाने होते हैं। "
संतोष जी के मुख से कीचड़ शव्द सुन अचानक मन व्यस्थित हो गया। किस कीचड़ की बात कर रहे हैं। मम्मी भी कहती थीं कि कीचड़ में गिरे रत्न को भी कोई नहीं छूता। दुनिया सफाई देखती है। ऊपर से साफ सब बिकता है। कांच भी रत्न बन जाता है। पर ऊपर की गंदगी ऐसी होती है जो चाहकर भी मिटती नहीं। फिर जिस लड़की के चरित्र पर ही कभी कीचड़ उछाली हो, वह गुणवती होकर भी त्याज्य होती है। उसे कोई नहीं स्वीकार करता।
अब मैं चुप चल रही थी। और संतोष जी मेरा गुणगान करते चल रहे थे। मेने किस तरह पूरे घर को एकजुटता में पिरोया है। किस तरह सभी का सम्मान करती हूं। नहीं आजकल की लड़कियां ससुराल में पैर बाद में रखती हैं, दूसरा चूल्हा पहले रखबा देती हैं।
इतना समय बीत गया। पर अभी भी जब मुझे वह दिन याद आता है तो भीतर तक सिहर जाती हूं।
उसका नाम क्या था। राकेश था शायद। पता नहीं वह मुझे प्रेम करता था, या नहीं भी। पर मुझे उसमें कोई आकर्षण न था। मैं रूपसी, वह काली शक्ल का। मैं ऊंचे खानदान की और वह छोटी जाति का। वैसे भी छोटी जाति बालों को मुंह नहीं लगाना चाहिये। यही मम्मी ने बचपन से सिखाया था। बचपन के संस्कार इतनी जल्दी मिटते नहीं। सही और गलत की धारणा तो बहुत बाद में जन्म लेती है। शिक्षा भी इसमें बदलाव नहीं कर सकती।
मेरे पिता जी प्राइमरी में अध्यापक। शिक्षा का अलख जगाते हैं। पर मुमकिन नहीं कि कोई नीची जाति का घर में कदम भी रख सके।
राकेश हमारे गांव से अगले गांव का रहने बाले हीरा चमार का लड़का। उसके माॅ बाप सब मजदूरी करते। दूसरों की फसल काटते। कई बार हमारे खेतों में भी फसल काटने आये थे।
पर लगता है कि ईश्वर सभी को कुछ न कुछ देता है। राकेश को न तो ऊंची जाति दी, न शक्ल सूरत दी, फिर भी गजब की बुद्धि दी। हमेशा विद्यालय में टाप करता। बजीफे से उसकी पढाई का खर्च निकलता। छुट्टियों में वह भी अपने पिता के साथ मजदूरी कर लेता। पर पढाई में कोई कौताही न करता।
" अरे सुम्मी। बिना बताये आ गयी क्या। थोड़ा आराम कर लो। दामाद जी कितने थक रहे हैं।"
अचानक मैं यादों से बाहर आ गयी। आबाज जानी पहचानी लगी। दूसरे गांव की रश्मी चाची हैं । हमारी ही जाति की हैं तो एक दूसरे के घर आना जाना भी होता रहता था।
" अरे चाची। आप। घर पर सब कैसे हैं। "
" सब ठीक हैं। चल थोड़ा घर चल। थोड़ा सुस्ता लो। फिर आगे बढना।"
"नहीं चाची। फिर कभी आऊंगी। अभी तो घर चलती हूं।"
" केवल अपनी सोचती है। दामाद जी की हालत भी देख।"
फिर मेरे पास बोलने को कुछ न था।
चाची ने हमारी अच्छी आवभगत की। ठंडा ठंडा मट्ठा पीने को दिया। सचमुच जान में जान में जान आ गयी।
" अरे कलुआ।"
चाची ने अपने बेटे को आवाज लगाई। कलुआ आया। मेरे और संतोष के पैर छुए।
" देख। जीजी और जीजाजी को घर तक छोड़ आ। मोटरसाइकिल ले जाना।"
"अभी रुको अम्मा।" कलुआ बाहर गया। फिर कोई पंद्रह मिनट बाद आया।
"अरे जरा सा काम बता दिया । जीजी और जीजाजी को घर तक मोटरसाइकिल से छोड़ आ। तो कहाॅ चला गया।"
"वही तो करने गया था। रविआ को भी ले आया हूं। दो मोटरसाइकिल हो जायेंगी। जीजी मेरी मोटरसाइकिल पर बैठ जायेंगी। जीजाजी रबिआ की मोटरसाइकिल पर बैठ जायेंगे। दिक्कत नहीं होगी। "
हम चलने को तैयार हुए। चलने से पहले संतोष थोड़ा फ्रेस होने घुस गये।
" तो कू एक बात बतानी है। शेरगढ़ को हीरा चमार थो। वो आओ थो गांव। संग में बाको लड़का भी थो। सारे गांव बालन कू बहुत सुना के गयो। बोल रहो कि मो ते जो कहनी सो कहते। मेरे घर बालन कूं कों गांव छोड़न पर मजबूर करो। गांव बाले बाके घर पर ठाकुर साहब ने ताला डाल रखो। लड़का ने वो ताला तोड़ लो। अभी गांव बालन को धमका कर गयो है कि अगर काऊ ने मेरे माॅ बाप से बत्तमीजी की तो अब बहुत बुरा होगो। पापा को मन भयो कि कछू दिन गांव में रहेंगे। जासू गांव में छोड़कर जा रहा हूं। "
राकेश का नाम सुनते ही एक बार फिर से मेरा मन घृणा से भर गया। उसी के कारण तो मेरे चरित्र पर कीचड़ उछली थी। उसी के कारण तो मेरी पढाई बंद हुई थी। हाॅ। वही तो है, मेरी बुरी यादों का कारण। जिसके कारण मैं चाहकर भी अपने मायके नहीं आती।
द्वेष की भावना सही या गलत नहीं जानती। मुझे पता है कि राकेश ने कभी भी मेरे साथ कोई अभद्र आचरण नहीं किया था। फिर भी उसके कारण मेने इतना अपमान सहा। सिक्के का दूसरा पहलू कि निर्दोष होते हुए भी राकेश और उसके परिवार ने कितना अपमान सहा, मेरी बुद्धि में नहीं आता। शायद यह बचपन के संस्कार हैं। मैं नहीं मानती कि नीची जाति बालों का भी कभी अपमान होता है। मान और अपमान तो बड़ी जाति बालों के होते हैं। छोटी जाति बालों का हमेशा दोष होता है।
एक तरफ मैं इस गलत धारणा को मान रही हूं। दूसरी तरफ गांव बालों की यह धारणा कि स्त्रियों का कभी अपमान नहीं होता, हमेशा स्त्रियों की ही भूल होती है, को अपना नहीं पा रही। शायद कुछ शिक्षा पा ली, इसलिये।
" ऐसा कैसे हो सकता है, चाची। एक नीच जाति बाला सभी को धमकी दे गया। आखिर है तो हीरा चमार का लड़का। कोई कलक्टर तो नहीं।"
"वही तो बन गया है, हीरा चमार का लड़का। तभी तो किसी की हिम्मत नहीं हुई। पुलिस बाले तो उसके पीछे साब साब कहकर भाग रहे थे।"
संतोष जी भी फ्रेस होकर आ गये।
" सुम्मी। तुम भी फ्रेस हो आओ। "
" नहीं। मुझे जरूरत नहीं है। "
मैं कलुआ की मोटरसाइकिल पर पीछे बैठकर और राकेश जी रबिआ की मोटरसाइकिल पर पीछे बैठकर चल दिये। अभी भी अनेकों यादों का तूफान मेरे मन में उमड़ रहा था। इतने में घर आ गया।
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मेरा सोचना गलत था कि संतोष जी को गांव मे तकलीफ होगी। गांव के माहौल का वह आनंद लेने लगे। गांव के लड़के उन्हें खेतों में घुमाने ले जाते। बाग में चले जाते। बच्चों के साथ ट्यूबवेल पर नहाने चले जाते। सुबह सुबह छाछ से पनहथी खाते। गांव की लड़कियां जीजाजी से मजाक करतीं। संतोष भी उन्हें चुटकुले सुनाते। आखिर जीजा और साली का रिश्ता मजाक का रिश्ता है।
मैं उन्हें लेकर ही इसलिये आयी थी कि उनके साथ पुरानी यादों से दूर रहूं। फिर भी अनेकों बार विचलित हो जाती। ऐसा विवाह से पूर्व अक्सर होता था। लगता कि वारिस की बूंदों में भीग रही थी कि अचानक बादलों से कीचड़ की बरसात होने लगी। उसने मुझे पूरा गंदा कर दिया हो। सफाई करने पर भी कीचड़ की छुड़ाने में असफल रहती।
सोचती कि आखिर हुआ क्या था उस दिन। कीचड़ की बारिश क्यों हुई। पर सोचकर भी उस कारण को देख न पाती।
सच तो यह था कि मुझे राकेश में कोई दिलचस्पी न थी। पर पढाई का क्या करूं। इंटरमीडिएट की पढाई आसान न थी। मैं पढने में भले ही कमजोर न थी। पर सहायता की आवश्यकता महसूस कर रही थी।
फिर एक ही उपाय था। राकेश से दोस्ती। मेरे लिये यह दोस्ती केवल मतलब हल करना था। पर लगता है कि राकेश ज्यादा सीरियस था।
मैं जानती थी कि हमारा साथ गांव बालों को पसंद नहीं आयेगा। सच में मुझे तो उसका साथ चाहिये भी न था। मैं तो उससे खेल रही थी। पर सबसे छिपकर।
पता नहीं कैसे मेरा खेल और राकेश की तरफ से जो कुछ था, एक से दूसरे के कानों से होता हुआ गांव तक पहुंच गया। उस दिन बहुत बदल गया। पूरे तीन गांव राकेश के खिलाफ थे। हीरा को भी बेइज्जत किया जा रहा था। नीची जाति बालों की ऐसी औकात कि ऊंची जाति बालों पर कीचड़ उछाले।हीरा और उसके परिवार को गांव से भगा दिया गया। वह कहाॅ गये। इससे मुझे क्या मतलब।
दूसरे दिन मैं स्कूल के लिये तैयार हो रही थी। तभी...
"कहाँ जा रही है।" आज पापा की आवाज ज्यादा कड़क थी। मैं समझ ही नहीं पायी कि क्या बात है।
"पापा स्कूल जा रही हूं। और क्या।"
"हे भगवान। एक तो पहले ही अपने दामन पर कीचड़ लगा चुकी है। अब हमें समाज में रहने भी नहीं देगी।" मम्मी ने रोना शुरू कर दिया। तब पता चला कि कीचड़ केवल राकेश के चरित्र पर ही नहीं लगी है, बल्कि उस अज्ञात कीचड़ से मेरा आंचल भी गंदा हो चुका है।
मेरी पढाई बंद हो गयी। पापा मेरे लिये लड़का देखने लगे। पर सफलता नहीं मिलती। पापा जहाँ भी जाते, उनसे पहले मेरे दामन पर लगी कीचड़ की सूचना मिल जाती। कई साल निकल गये। तब संतोष जी से मेरा विवाह हुआ। उसमें भी पापा ने सतर्कता दिखाई। किसी को ज्यादा पता नहीं लगने दिया।
गांव के वातावरण में संतोष जी जितने खुश थे। पापा उतने ही चिंतित। अकेले में एक दिन मेरी बेबकूफी पर बोल भी दिया । गांव बालों का क्या है। अगर किसी ने दामाद जी को कुछ बता दिया तो फिर किस तरह इस कीचड़ को हम ढोएंगें।
दूसरे ही दिन मैं ससुराल चलने को तैयार थी। संतोष जी की छुट्टियां अभी शेष थीं। पर मेरे आगे उनकी न चली। विदा के समय माॅ भी गले लगी। गांव का कोई टैक्टर तलाशा जाने लगा, जो हमें मुख्य सड़क तक छोड़ आये। वहां से हम बस पकड़ लेंगें।
"राम राम चाचा। क्या इन्हें शहर तक जाना है। मैं छोड़ दूंगा।"
पीछे से राकेश की आवाज आयी। अच्छे सलीके से कपड़े पहने था। सरकारी गाड़ी में एक ड्राइवर और एक सिपाही पहले से बैठा था।
"पापा से मिलने आये थे। अब वापस जा रहे हैं। आपके रिश्तेदारों को शहर छोड़ दूंगा। "
राकेश ने फिर से बोला। पापा तो कुछ भी बोलने की स्थिति में न थे। मेने ही कहा।
"आप को कष्ट होगा कलक्टर साहब। हम कोई और साधन तलाश लेंगें।"
"अरे। गांव बालों के लिये मैं क्या कलक्टर। "
आखिर हमें बैठना पड़ा। गाड़ी हवा से बातें करने लगी। मुख्य मार्ग के बाद शहर तक बढने लगी।
"कलक्टर का मतलब पता है क्या?" राकेश ने पूछ लिया। मैं चुप रही। पर संतोष बोल पड़े।
" हाॅ हाॅ। जानता हूं। कलक्टर पुराना नाम है। जब इंडियन सिविल सर्विस थी। अब आई ए एस बनने के बाद जिलाधिकारी कहलाते हैं। एम आई राइट सर।"
"हाॅ सही है। पर पूरी तरह से नहीं। कलक्टर का मतलब है कीचड़ साफ करने बाला। कलक्टर वह है जो अपनी मेहनत के बलबूते खुद की कीचड़ साफ कर सके। कलक्टर वह है जो अपनी मेहनत के बलबूते अपने खानदान की कीचड़ साफ कर सके। कलक्टर वह है जो उसके दामन पर लगी कीचड़ भी साफ कर सके, जिसे उसने कभी प्रेम किया हो। "
लगता नहीं कि संतोष जी इन बातों का अर्थ समझ पाये हों। शहर आ गया। यहां से हमारे ससुराल के लिये सीधे बस मिल जायेगी। बस स्टैंड पर हम उतर गये। संतोष ने कृतज्ञता में राकेश के सामने हाथ जोड़ दिये। पर राकेश खुद गाड़ी से बाहर आया।
" सुनो दोस्त। अपनी पत्नी के आचरण पर कभी शक मत करना। भले ही वह ऊंच और नीच को मानती हैं फिर भी उनका दामन एकदम साफ है। वह पढने में होशियार हैं। उन्हें आगे पढाना। कभी भी मेरी जरूरत हो तो बेझिझक आ जाना।"
इस बार मेरे भी हाथ राकेश के समक्ष जुड़ गये। जहाँ ऊंची जाति बाले सभी ने मेरे दामन पर कीचड़ लगायी। वहीं छोटी जाति का राकेश मेरे दामन की कीचड़ को मिटा गया। फिर ऊंचा कौन है। ऊंची जाति के हम लोग या नीची जाति का यह राकेश।
समाप्त
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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