बहुत शांत है गलियांँ मेरे शहर की
लगता है, सन्नाटों का कहर है।
कभी हंँसती खिलखिलाती जिंदगी थी,
आज खौफ के साथ हवा में भी जहर है।
हर तरफ दर्द का दरिया है.....
एहसास बिखरते जाते हैं,
गले लगाना तो दूर.......
अपने, अपनों से हाथ भी ना मिलाते हैं।
"जिंदगी एक नेमत है"हमेशा सुनते आए हैं,
पर क्या पता था........
श्मशान में भी लाइन लगाए जाते हैं।
सुना है आबोहवा बदल गई इस दुनिया की,
पर ये न जाना था कि.......
हवा बेचकर भी पैसे कमाए जाते हैं।
बहुत हो चुका डर के साए में जीना अब,
चलो, खौफ के मंजर को फिर खुशनुमा बनाते हैं।
मानवता के आंँगन से.......
जी भर के खिलखिलाने की वजह ढूंँढ कर लाते हैं।

                    ‌‌    मेरे शब्द मेरी कलम से
   ‌                         मीनू "सुधा