होती थी जिनमें सपनों की दुनिया,
मिलती थी उनसे असीम खुशियाँ,
जाने कहाँ ओझल हो गयी वो
बुजुर्गों की नैतिक शिक्षा की कहानियाँ...।

कभी वन पर, कभी उपवन में,
कभी बाल पर, कभी यौवन में,
कभी छत पर, कभी आंगन में,
उगती थी कल्पनाओं की नन्ही टहनियाँ
जाने कहाँ ओझल हो गयी वो,
बुजुर्गों की नैतिक शिक्षा की कहानियाँ...।

राजा कभी जंगल में भटकता था,
शियार कभी नीले पानी में नहाता था,
भूत जो उस पीपल पर रहता था,
अच्छाई के साथ बताती थीं वो हानियाँ
जाने कहाँ ओझल हो गयी वो
बुजुर्गों की नैतिक शिक्षा की कहानियाँ...।

चंचल मन हर रात दादा के पास होता,
धीरे-धीरे पैर दबाता और हुंकरे भरता,
चित्त कहानी के साथ जाने कहाँ उड़ता,
सूने हो गये घर अब, छायी विरानियाँ 
जाने कहाँ ओझल हो गयी वो
बुजुर्गों की नैतिक शिक्षा की कहानियाँ...।

उन किस्सों में भविष्य होता था,
उन बातों में समस्या का हल होता था,
उन कहानियों से विश्वास अडिग होता था,
मजबूत व्यक्तित्व की होती वो छतरियाँ 
जाने कहाँ ओझल हो गयी वो
बुजुर्गों की नैतिक शिक्षा की कहानियाँ...।

स्वरचित व मौलिक✍
सुमित सिंह पवार "पवार"
उत्तर प्रदेश पुलिस
आगरा