प्रिति - सुनिऐ मुझे बहुत नींद आ रही है , कल
बात करते है
देव - ओके ,गुड नाईट
प्रिति - गुड नाईट
प्रिति फोन आँफ करके सो जाती है।
इसी तरह दोनो मे हर रात वाट्सएप पर बाते होने लगती है , काफी हद तक दोनो एकदूसरे के स्वभाव ,
पसंँद - नापसंँद से परिचित हो जाते है।
दूसरे दिन प्रिति सुबह उठकर पूजा अर्चना करके अपना रोजमर्रा के कामो मे लग जाती है। अभी उसकी
सासु माँ नहीं है तो अपने कामो से सही समय पर करके निजात हो जाती है।
नहीं तो उसकी सासु माँ प्रिति के लिए कोई ना कोई बखेड़ा बिखरा कर ही रखती थी, ताकि प्रिति अपने लिए दो पल फुरसत का ना निकाल सके।
सारा दिन गृहकार्यों मे उलझी और अवि के पीछे भाग दौड़ कर के , उसे रात को खाने खिला कर , उसके
साथ खेलकर उसे सुला देती है। अवि के बिखरे खिलौने को उसके खिलौने को बास्केट मे रख देती है।
अपने कमरे की साफ सफाई करके , खुद फोन लेकर
लेट जाती है।
वाट्सएप खोलते ही देव का मैसेज आता है।
देव - hii
प्रिति - hello
देव - आज आपका काम जल्दी हो गया क्या , इसलिए आज जल्दी आई है
प्रिति - हाँ
देव - कैसा रहा आपका दिन??
प्रिति - वैसा ही जैसा रोज रहता है , कुछ खास नहीं
देव - आपके पति आए नहीं अभी तक??
प्रिति - नहीं , नानी जी की तबियत ज्यादा ठीक नहीं है और मामाजी अकेले है तो मम्मी जी के साथ उन्हें भी रोक लिया की जरुरत पर वो मदद.कर सके । एक अकेला इंसान कहाँ - कहाँ देखेगा।
देव - अवि याद करता होगा अपने पापा और दादी को
प्रिति - हाँ बहुत ज्यादा क्योंकि उसको अपनी दादी से अत्यधिक लगाव है। मुझसे भी ज्यादा , काहे की मै तो स्कूल चली जाती थी , पीछे से मम्मी ही संभालती थी।
रोता है कभी - कभी मगर समझाने से चुप हो जाता है।
देव - अच्छा!! एक.बात बताईए सभी औरते गर्मी की
छुट्टियों मे मायके जाती है , आप नहीं जाती है।
प्रिति - कम ही जा पाती हूँ
देव - क्यों??
प्रिति - मेरा दो मायका है।
देव - कैसे.??
दो मायका मतलब, जरा विस्तार से बताईये।
प्रिति - बताना शुरु करती है
मेरी माँ( स्नेहा) पहली बार माँ बनने वाली थी।मगर मेरी माँ को अंदर से कोई खुशी नहीं थी , क्योंकि मेरी माँ ने अपनी जिंंदगी मे सबसे बड़ी गलती मेरे पिता (मनोज) से प्रेम विवाह करके की थी।जो मेरी माँ के कमाएंँ हुए पैसो को दीमक.की तरह खा रहे थे । ना मेरी माँ का ख्याल रखते ,ना ही घर मे ,.आवारागर्दी और अपनी अय्याशीयो मे लीन रहते।
.
मेरे पिता से शादी करने से पहले मेरी माँ को नाना जी और नानी जी ने बहुत समझाया था, मगर ना.जाने क्यों समझ नहीं पाई , शायद आँखो मे प्यार की पट्टी बँधी थी और मेरे पिता की कृतियों से अनभिज्ञ रह गई।
मेरे माँ पिता का विवाहित जीवन कुछ दिन तो सुख पूर्वक बीता । धीरे- धीरे उनकी आदतो से माँ भी वाकिफ होने लगी।
शादी के छः महीनों बाद ही मेरी माँ प्रेगनेंट हो जाती है।
मेरी माँ के प्रसव के समय मेरे नाना नानी जी और मामू ( मनु )गाँव से आ गए थे। वो मेरी पिता की
आदतो से वाकिफ थे और मेरी माँ के लिए सदैव चिंतीत रहते थे। वो हमेशा गाँव जाने के लिए कहते थे लेकिन माँ. ये कहकर मना कर देती थी ,
स्नेहा ( प्रिति की माँ) - " आपने मुझे पाल पोष करके इस काबिल बनाया है कि मै खुद कमा सकती हूँ और वैसे भी मेरी गलतियों की सजा आप क्यों भुगते। आपने तो मुझे बहुत समझाया था , मै ही अंधी हो गई थी प्यार मनोज के प्यार मे"
प्रिति - मेरी माँ. ने रात को नानी जी के साथ मिलकर खाना बनाया सबको खिलाया और खुद भी खाकर
सो गई। आधी रात को माँ को पेट मे असहनीय दर्द होनेलगा। नानाजी और भाई ने मिलकर घर के
पास वाले अस्पताल मे भर्ती करवा दिया।
अस्पताल भर्ती करवाने के दस मिनट बाद सिस्टर नानाजी को आकर खबर देती है ..
सिस्टर - ."मुबारक हो आपके घर जुड़वा लक्ष्मी आई है।"
नानाजी नानीजी और मामू बहुत खुश होते है। हद तो तब हो गई , जब मेरी माँ को पिताजी की सबसे ज्यादा जरूरत थी , उस समय उनका का कोई अता -पता नही था।
प्रिति - माँ को जब होश आता है वह बहुत खुश होती है । मगर उनकी नजरे पिताजी को तलाश रही थी, मगर होते तब न दिखाई देते।
जब नानी माँ को रोते हुए देखती है। समझ तो जाती है पिताजी(मनोज) को न पाकर माँ का मन व्यथित है।
नानी - पूछती है क्या हुआ बिटिया काहे रो रही हो??
कोनो तकलीफ है क्या?? हम डाक्टर से अबही बात कर के आते है।
स्नेहा ने कहा(प्रिति की माँ ) - "नहीं माँ हमका कोनो तकलीफ ना ही , किंतु हमे मनोज से ई आशा नही किए थी , पहली बार बाप बना है मगर उसको तनिक भी हमरी और हमरे बच्चों की परवाह नाही , ई सोचकर हमरी आँखन म आँसु आ गए।"
नानी - "का करोगी दुख करके सबका अपना - अपना भाग्य , अब तो तुम्हें दो बेटियों को पालना पोषणा करना है तो हौसले से काम लो।"
स्नेहा - "ने कहा , माँ हम पर एक उपकार करोगी।"
नानी - "ऐसन काहे कह रही हूँ , हम तुमरी माई है ,
जो कहना है हक से कहो बिटिया।
स्नेहा - "माँ हमरी एक बिटिया को तुम अपने साथ ले जाओ। अभी हमरी घर की आर्थिक स्थिति भी उतनी
अच्छी ना ही है। दो बच्चों को पालने भी अकेले जाँब के साथ हमरे बस मे ना ही।मनोज को तुम जानती.ही हो कितना निहाल करेगा।"
स्नेहा - "तुमरे पास रहेगी तो हम निश्चित रहेंगे।"
नानी - ने कहा बिटिया के बगैर रह पाओगी??
माँ ने कहा - "रह लेगे माँ कम से कम हमरी बिटिया की जिंदगी तो बर्बाद नहीं होगी। तुम्हारे आगे हाथ जोड़ते है माँ।"
नानी ने कहा - "नहीं ....नहीं बिटिया ऐसा ना कहो।
ई तो हमरे लिए सौभाग्य की बात है।
तुम्हारे जाने के बाद घर बहुत सुना- सुना हो गया था।मनुवा भी तुमको बहुत याद करता था , हमारे घर में तो फिर से रौनक आ जाएगी तुम भी चलती तो अच्छा रहता बिटिया।"
माँ ने कहा- "नहीं माँ मै साथ नहीं जाऊँगी।
मेरे पीछे -पीछे मनोज भी आ जाएगा।मेरी तो जिंंदगी
खराब हो ही चुकी है , लेकिन अब मै आप सबका
नाम गाँव मे खराब नहीं करना चाहती हूँ।"
प्रिति - मेरी माँ ने मेरा नाम "प्रिति" रखा और मेरी बहन का नाम "कीर्ती" रख देती है।
मेरी नानी एक महीना मेरी माँ के पास रहती है। जब तक मेरी माँ पूर्ण रुप से स्वस्थ नहीं हो जाती है।
पिताजी को हर दिन उनकी जिम्मेदारीयो का अहसास करवाती ,समझाती थी
प्रिति को मै अपने साथ ले जाऊँगी। मगर मेरे जाने के बाद आपको ही कीर्ति और स्नेहा का खयाल रखना है।
और इस तरह से हम दोनो जुड़वा बहने एकदूजे से जुदा हो जाती है।
माँ मुझे सीने से बारम्बार गले लगाकर आखिरी बार ममता का दूध पिलाकर मेरा माथा चूमकर नानी जी को सदा के लिए दे दिया।
प्रिति की माँ कहती है नानी से - "कैसी अभागन माँ हूँ.... माँ चले जाईए इसे लेकर मुझ से दूर ..बहुत दूर
कही मै कमजोर न पड़ जाऊँ , इससे पहले ले जाईए माँ"
नानी भी रोते -रोते मुझे गोदी मे लेकर अपना सारा समान लेकर.बाहर आकर नानाजी को चलने को कहती है।
नानाजी ,नानीजी से कहते है जैसे बिटिया की मर्जी ...आता हुँ मिलकर अपनी बिटिया से फिर चलेंगे गाँव..कहकर मिलने जाते है माँ से …
माँ नानाजी को देखकर फूट-फूटकर कर उनके गले लगकर बेइंतहा रोने लगती है।
नानाजी जाते-जाते माँ के सर.पर हाथ रखकर कहते है ...अपना ख्याल रखना...मनी आर्डर भेजता रहुँगा।
भींगी पलके लेकर नानाजी नानीजी मुझे लेकर अपने
घर चले जाते है।
क्रमशः.........

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