मैं भी इक जीव हूं, नारी हूं 
फ़िर क्यूं मैं सबको, भारी हूं

बेटी होना, मेरा,  पाप  है ? 
या नारी जीवन अभिशाप है

हो,कर्त्तव्यविमुख तज रहा मुझे 
तू   कसाई  है, या  बाप  है

सुना है तुझमें,  ममता रवां है
तुझसे पैदा सब,तुझसे जहां है

कोख़ में मिटाने को तू आतुर 
किधर है,तेरा प्यार, कहां है 

ये कैसी विवशता है तेरी,मां 
तेरे  सिवा मेरा, कौन यहां हैं

मैं भी इक जीव हूं, नारी हूं 
फ़िर क्यूं सबको, भारी हूं

दो घरों को सेतु बनाती हूं
मध्य में प्रीत नदी बहाती हूं

मैं भी इक जीव हूं, नारी हूं 

मां की आंखों के हो  तारे,
ओ पापा के तुम राज दुलारे

छीन लिए हैं मेरे हक सारे
तूने  भ्राता  प्यारे,  प्यारे

सदा  रखना मुझसे ऐसे स्नेह
बरसे बंजर ज़मीं पर जैसे मेह

भोग विलास की नहीं हूं वस्तु 
मान सम्मान की अधिकारी हूं

मैं भी इक जीव  हूं, नारी  हूं 
फ़िर क्यूं मैं सबको, भारी हूं

परमेश्वर  माना तुझे  पतिदेव
अपना सब कुछ तुझपे वारी हूं

पर नारी  की  लिप्सा में  तुम
कुचल ना देना कोमल मन को

प्रीत की बगिया के हो माली
आग ना लगा देना उपवन को

सौंप दिया तुझे लाज़ का गहना
जीवन भर  तू  साथ ही  रहना

रक्त बीज का बन जाती हूं काल
मैं काली,खड़ग खप्पर धारी हूं 

महिषा सुर का मर्दन करने 
दुर्गा बन करती सिंह सवारी हूं,

मुझे अबला समझ ये न भूलो 
भला किसी से मैं कब हारी हूं

घर चलाती हूं मैं,और दफ्तर 
नहीं हूं मैं किसी  से कमतर

मैं भी इक जीव हूं, नारी  हूं
अबला नहीं,सबला नारी हूं


भूपेन्द्र चौहान