अलकनंदा अनुजा मंदाकिनी,
केदारनाथ  तुम   प्रकट   भई।
रुद्रप्रयाग  में  संग  अलकनंदा ,
देवप्रयाग तक  तुम बह  चली।।

देवप्रयाग  में  संगत   पाई,
भागीरथी नाम्नी बहन की।
तीनों मिलकर एक जो हुई,
परम पावनी गंगा तुम भई ।।

तेरे  इस   पावन   तट   पर   हैं,
पुण्यस्धल पग पग पर  कितने ही।
यहाँ  ऋषियों  की  तपस्थली  है,
प्रभु  की   लीलास्थली   यही  है।।

तेरे     पावन  तट  पर   बसा,
पावन  धाम  है  चित्रकूट का।
वनवास  के  ग्यारह  वर्ष  यहाँ,
निवास स्थली था प्रभु राम का।।

अनुसूया के तप से प्रकटे,
तेरे  तट  पर  राम  थे  रहे।
प्रभु राम के यहाँ स्नान से,
परम पावनी हो तुम सोहे ।।

पुण्यप्रदायिनी  हे  मंदाकिनी!
तुम अलकनंदा,गंगा तुम कभी ।
तुम  पावन  माता  सबकी  ही ,
कोटि  नमन   है  तुम्हें   हमारी ।।

-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर "
(मुखचित्र गूगल से साभार)