स्वयं ह्रदय के कोनों में,जमा किए अनगिनत जज़्बात,
संबंधों को लगे सहेजने,समझे इन्हें जीवन की सौगात!!

कभी किसी ने कसदी फिफ्टी, कभी किसी ने सुना दी चार,
बैठ गए हम लगे सोचने,आती दिल में बात बार बार!!

जूझते अपने ही मन से,लेते दोष अपने ही आप से,
खुद को देते लाख दिलासा,मरती हर क्षण दिल की आशा !!

यहीं आत्मसम्मान गिरता है,यहीं विश्वास बदलता है,
अब समझ सब आया है,जब अनुभव को पाया है!!

दुनिया सारी शक्ति लगाती, पीछे हमें धकेलने को,
और हम बिकते रहते, दिखावटी परपंचो में!!

अंतरमन कि आंखे खोलो, लोगों के दिल में झाकों,
कितना छल,कपट कर रहे, हमें भटकाए रहने को !!

निकलो इन जज्बातों से,बचो इन आघातों से,
बेचो इस कबाड़ख़ाने को, हर क्षण के आघातों को !!

कब तक इनको जोड़ रखोगे,कब तक इन्हें सभालोगे,
ये मौन को ना समझेंगे, विश्वास घात का शूल चुभा देंगें !!!

निकलो घोर निराशा से, मिलो भोर की आशा से,
हमको ही कदम बढ़ाना पहले, फिर चाहे दुनिया जो कह ले !!!

स्वरचित, मौलिक, सर्वाधिकार सुरक्षित,

कीर्ति चौरसिया
 जबलपुर (मध्य प्रदेश)