जिनके मन में हो आत्मविश्वास और ज्ञान के चक्षु खुलते है,
वही महापुरुष संसार में महात्मा बुद्ध कहलाते है।
महलों में पले थे नही जानते थे संसार की सच्चाई को,
बीमारी,बुढापा और मृत्यु से दूर रखते थे पिता सिद्धार्थ को।
लेकिन विधाता ने तो कुछ और ही खेल था रचाया,
विधि के विधान से ही राम वनवास हुआ महाभारत गया रचाया।
सिद्धार्थ के जीवन में भी वो दिन था आया,
जब ईश्वर ने उन्हें बृद्ध, बीमार और मृत्यु से रूबरू कराया।
देख कर यह दृश्य मन उनका करुणा से भर आया,
और जब सन्यासी को देखा तो मन बैराग्य में समाया।
छोड़ कर महलों के सुख सारे पुत्र और पत्नी को भी छोड़ा निद्रा में,
चल पड़े वो स्वयं की खोज में और भटके है वन-वन में।
वो बैसाखी पूर्णिमा का दिन चन्द्र अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण हो अस्ताचल को जा रहे थे,
और सूर्य अपनी रश्मियों सहित आकाश से उदित हो रहे थे।
धीरे-धीरे सिद्धार्थ के ज्ञान चक्षु खुल रहे थे,
तब समझ आया कि कस्तूरी तो स्वयं के ही अंदर है हम यूँ ही भटक रहे थे।
हो गयी साधना सफल वो ज्ञान से परिपूर्ण हो गए,
और आज सिद्धार्थ से वो महात्मा बुद्ध बन गए।
दिया है संसार को ज्ञान का उपदेश और अष्टांग मार्ग भी बतलाए,
सत्यधर्म के मार्ग पर खुद भी चले दूसरों को चलाया और पंचशील के नियम भी सिखाये।
देवदूत बन कर आये थे संसार से अधर्म को मिटाकर धर्म का प्रचार कर गए,
वो महाज्ञानी महात्मा बुद्ध कुशीनगर में ब्रह्मलीन हो गए।।
बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं💐💐
शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश

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