नानाजी  जाते-जाते माँ  के सर.पर हाथ रखकर कहते है ...अपना ख्याल रखना...मनी आर्डर भेजता रहुँगा।

भींगी पलके लेकर नानाजी नानीजी मुझे लेकर अपने 
घर चले जाते है।

मेरे नानाजी मुजफ्फरपुर मे रेलवे मे उच्चपद पर
कार्यरत थे। अच्छी तनख्वाह मिलती थी। पैसो की कोई कमी ना थी।

मै नन्ही-सी, दूध मुही बच्ची प्यारी -सी गेहूँआ रँग की.बड़ी -बड़ी आँखे हाथ पाँव मारती हुई शांँत बच्ची थी। भूख लगती तभी रोती वरना पालने मे खेलती
रहती।

ऐसा मेरी नानी जी मुझे बोला करती थी अक्सर मै जब बदमाशीयाँ किया करती और जब उनकी बाते नहीं सुना करती थी , तब कहती थी नानी , बचपन मे एक दम सीधी शांत थी और अब चपल तुरंगी हो गई हो।

मै नाना-नानी की राजदुलारी धीरे-धीरे बड़ी
होने लगी। कभी नानू को घोड़ा बनाती ,कभी मामू
के साथ बाजार घूमने जाती और बाजार से कभी हाथ मे खिलौने या टाँफी ले आती।

अपने नानी और नानाजी को माँ बाऊजी कहती थी और मामा को भईया कहती थी।

अपनी मीठी -मीठी शरारतों से सबका मन मोह लेती है। नानी को खाने मे खूब नखरे दिखाती,मगर लाडली होने की वजह से हर फरमाईश पूरी की जाती।

जब मै तीन साल की थी ,तब नानू ने मेरा स्कूल मे दाखिला करा दिया था।

नानु मुझे और  मामू को खुद ही पढाते। गल्तियांँ करने पर मुझे धीरे से डाँटते थे मगर मामू को तो डाँटते भी थे सजा के तौर पर मुर्गा भी बना देते थे।

जब मै नाराज हो जाती थी , मुहँ फुलाकर बैठ जाती तो मुझे मनाते और बताते जीवन मे पढ़ाई की अहमियत क्या होती।

मै नटखट के साथ समझदार भी थी । मनाने से जल्दी मान जाती थी। झट से नानु के गले लग जाती। और कहती आगे से ध्यान रखूँगी।

मेरी नानी बहुत अनुशासित थी। मुझ से स्नेह तो बहुत करती थी मगर डाँटती भी थी।वो चाहती थी मै पढाई के साथ- साथ अन्य कामो मे भी अव्वल रहुँ।

मेरे नानु मुझे कभी किसी चीज के लिए मना नहीं करते। बल्कि अपना वेतन मेरे  हाथ मे दे दिया करते थे।अपनी मनमर्जी से कपड़े पहन सकती थी। मेरे ऊपर किसी तरह की  कोई पाँबदिया नहीं थी। मै अपनी जिंंदगी शानौशौकत से जीया करती थी।

देखते -देखते मैने स्कूल से काँलेज कम्पीलिट कर लिया था। अपने नानाजी और नानीजी के काम मे
मदद किया करती थी।

नाना -नानी जी तो मुझे हरफनमौला कहते थे।

मेरे भाई यानि मामू को नौकरी मिल जाती है ,एक रिपोर्टर की , घर मे सभी बहुत खुश होते है।


प्रिति -  मनु को कहती है" चल भाई अब तो तेरी नौकरी लग गई है चलो मुझे पार्टी दो।
ज्यादा नहीं तो गरमा गर्म जलेबी और समोसा ही खिला दो"

मनु - "कहता है भुक्कड़ कही की चल तुझे बाईक मे
घुमा कर खिलाते हुए ले आऊँगा।"

प्रीति -  बोलती है रूको थैला लेकर आती हूँ ,लौटते
वक्त माँ बाऊजी के लिए लेते आऊँगी ,ठीक है न भाई।

मनु  - "कहता है हम्म ले लो। बाते ही बनाओगी या चलोगी भी।"

"आती हूँ न भाई" ...प्रीती हँसती हुई चली जाती है।

इधर माँ बाबूजी एकदूसरे से बात करते है की मनु का रिश्ता आया है ,मेरे दोस्त ने बताया है। 

देखो तस्वीर कैसी लग रही है। सोचता हूँ कर लेता हूँ फिर प्रीति के भी हाथ पीले जल्द ही कर दूँगा।

नानाजी नानीजी से पूछते है "कैसी लगी तुम्हें लड़की?? "

नानी - लड़की देखने मे तो सुंंदर है। का नाम है इसका??

नाना जी -  "सुषमा नाम है ओका "

बाऊजी कहते है मुझे लड़की बहुत पसंद आई । मनु और प्रीती घर आएँगे तो तस्वीर दिखा देना।

उन दोनो बच्चो को अच्छी लगेगी तभी बात आगे बढाएंँगे।

नानी कहती है "जी ठीक है।"

मनु और प्रीती दोनो घूम कर, खा कर आते है। 

प्रीती माँ बाऊजी के लिए प्लेट मे डालकर खाने को देती है।

माँ कहती है प्रीती देख तो ये तस्वीर, मनु के लिए
शादी के लिए रिश्ता आया। देखो तो कैसी है?? 

प्रीती तस्वीर देखकर बोलती है, बहुत सुंंदर है, माँ मुझे तो बहुत पसंँद आई , जाती हूँ भाई को दिखाकर आती हूँ।

प्रीती मनु के पास गुनुगुनाते हुए जाती है….सुन सुन
भैया तेरे लिए एक रिश्ता आया है.……

मनु खींचते हुए कहता है..." पगला गई हो क्या"…

प्रीति खिलखिलाकर हँसते हुए कहती है ..."हम तो नही तुम जरूर पगलाने वाला हो…"

देख लो भाई हमे तो बहुत पसंद आई ...नहीं कछु
बोलोगे तो खूँटे से बाँध दिए जाओगे।

तस्वीर मनु के कमरे मे टेबल पर रख कर चली जाती है।

माँ बोलती है प्रीती को "ऐ छोरी क्या बोला तेरे भाई ने" 

प्रीती कहती है, हम से का पूछ रही हो ,माँ कल खुद ही पूछ लेना भाई से ...हम तो चले सोने ,हमे तो बहुते नींद आ रही है।

प्रीती उबासी लेती हुई सोने चली जाती है।

माँ कहती है प्रिति से ठीक है सो जाओ ...सारा दिन घर का काम ...उछल कूद करती रहती हो ...थक गई होगी ...। हम खुद ही पूछ लेंगे दिन मा कल मनुवा से।

सुबह माँ और प्रीती उठकर घर का काम करके नाश्ता बनाने लग जाते है। तब तक मैं मनु और बाबूजी नहा धोकर नाश्ता के लिए आ जाते है।

माँ ने मनु से पूछा... का रे छोरा कैसी लगी।मनु ने कहा आप दोनो को जैसे ठीक लगे ..मुझे कोई दिक्कत नहीं।

सभी खुश हो जाते है।बाबुजी कहते है कल ही चलेंगे
देखने ...पसंद आ जाएगी तो बात कल ही पक्की
कर आएँगे।

सभी दूसरे दिन लड़की देखने जाते है। सभी को बहुत पसंद आती है। प्रीती को एक नजर मे पसंँद आ जाती है अपनी सुषमा भाभी।

मनु और सुषमा की सहमति से शादी पक्की हो जाती है।
..
.
सुषमा की माँ..पंडित जी से विवाह की तारीख
निकलाने को कहती है।एक महीने के बाद शादी की
तारीख पक्की हो जाती है।दोनो परिवार एक दूसरे को मीठा खिलाते है।

घर आकर प्रीती की फरमाइशे शुरू हो जाती है। प्रीती कहती है अपने बाऊजी से मुझे शादी की शाँपिग करनी है , बहुत सारी ...।

बाऊजी कहते है.. "अरे मेरी अम्मा तुझे मै खुद ले चलूँगा,जो चाहिए वो ले लेना।"

प्रीती बहुत खुश होती है , साथ मे माँ भी…..मनु का तो कहना ही नहीं ...वो तो खयालो मे गुम….

मेरे सपनो की रानी कब घर आएगी तू….के सपने
बुन रहा था।

दूसरे दिन प्रीति अपने माँ बाऊजी के साथ शादी के लिए कपड़ें खरीदने जाती है। अपने लिए
माँ और भाभी के लिए सिल्क , जोरजेट, सिफान की साड़ियांँ खरीदती है। फिर अपने भाई और बाऊजी के लिए खरीदारी करती है। 

शापिंग करते -करते प्रीती बहुत थक जाती है। बाऊजी से कहती है , अब तो मुझसे एकदम भी चला नही जा रहा है , मुझे बहुत भूख लगी है।

पहले कुछ खा ले ….उसके बाद ही खरीदारी करेंगे।
बाऊजी ने कहा तुझे जो खाना है खा ले बिटिया।

प्रीती को पुचका वाला दिख जाता है ...वो कहती
मुझे तो गोलगप्पे खाने है…

बाऊजी ने कहा ठीक है चलो..। पुचके वाले को प्रीती
बोलती है खिलाने को…..खाते ही लगी मुहँ बनाने..न तीखा है ना खट्टा है ना ही मिर्च...कैसा खिला रहे ह़ो??

प्रिति - ओ भईया , ई का खिला रहे हो हमका , हमका तो तनी खट्टा -खट्टा पानी वाला,तेज चटपटेदार मसाला वाला खिलाओ…तो लगे कि कुछ खाया है।

प्रीती ने जैसा खाया तीखा - तीखा पुचका ...खाते ही
मुहँ मे बोली ..मजा आ गया...इतना तीखा पुचका खाते ही इसके माथे से पसीना टपकने लगा….मसाला के झाल से उसकी हालत खराब थी। फिर भी वह खाना नहीं छोड़ रही थी ।

उसकी हालत देखकर माँ बाऊजी उसे मना कर रहे थे।
प्रीती ने कहा ऐसा पुचका का खाने का मजा ही
कुछ और है ऐसा कहकर फिर से खाने लगी।

क्रमशः