आज जब भी देशभक्तों की बात चलती है तो सहसा एक नाम मन में आता है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई थी। तथा अंग्रेजों को अनेकों बार शिकस्त दी। अंग्रेजों से युद्ध करते करते अपने प्राण गंवा दिये पर उनकी आधीनता स्वीकार नहीं की।

  आज जब भी रानी लक्ष्मीबाई का नाम सम्मान से लिया जाता है तभी ग्वालियर के सिंधिया राज घराने का नाम गद्दारी के लिये याद किया जाता है। उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई के खिलाफ युद्ध में अंग्रेजी सेना की मदद की थी। सिंधिया राज घराने के वंशज आज देश के प्रमुख राजनीतिकार हैं। आज भी अनेकों बार अपने पूर्वजों की भूल के कारण संसद में अपमानित होते हैं। सत्य ही है कि पूर्वजों के कर्म भी मान और अपमान का कारण बनते हैं।

   किसी कुल के किसी व्यक्ति के आचरण का प्रभाव पूरे कुल पर पड़ता है। पर इसका यह अर्थ कभी नहीं है कि उस कुल के सारे लोग एक जैसे ही हों। राक्षस कुल में रावण के साथ विभीषण भी हुए थे। ग्वालियर के नरेश दौलत राव सिंधिया ने अंग्रेजों को अनेकों बार युद्ध में हराया था।

  अंग्रेजी सेना ने ग्वालियर पर हमला कर दिया था। महाराज खुद सेना का नैत्रत्व कर रहे थे। उनके पराक्रम से अंग्रेजी सेना के पैर उखड़ने लगे।

   खेल की तरह युद्ध भी अनिश्चितता भरा होता है। अनेकों बार शत्रु सेना का पीछे हटना एक योजना होती है। अनेकों बार आरंभिक जीत एक बड़ी पराजय की भूमिका होती है। ऐसा ही हुआ। महाराज दौलत राव सिंधिया शत्रु सेना के मध्य अकेले फंस गये। पर उन्होंने हार नहीं मानी। अकेले युद्ध करते रहे। उनका जीवन समाप्त हो ही जाता कि शत्रु सेना का घेरा तोड़कर एक युवा सैनिक उनके पास आ गया। एक और एक मिलकर दो नहीं ग्यारह होते हैं। युवा सैनिक जिसकी अभी मूंछ भी नहीं आयी थी, बड़ी कुशलता से युद्ध कर रहा था। शायद केवल इतना बोलना उस वीर के काफी नहीं होगा। अंग्रेजी सेना पर वह महाराज के साथ काल बनकर टूट पड़ा। अंग्रेजी सेना भाग खड़ी हुई।

  " कौन हो तुम वीर। इतना वीर नहीं देखा। तुम्हारी बहादुरी काबिले तारीफ है।"

   अपने सेना के मध्य जब खुद महाराज ने उस युवक का परिचय पूछा तो सभी की नजरों में उसका सम्मान बहुत बढ गया। कल तक मूंछ न होने व जनानी आवाज के कारण पद्मसिंह के साथी उसकी मजाक बनाते थे। पर आज वे भी उसका सम्मान कर रहे थे। पद्मसिंह अब सैनिक से हवलदार बन गया। महाराज को उसपर विशेष विश्वास था। युद्ध और शिकार के समय भी महाराज दौलत राव उसे अपने साथ रखते थे।

  सफलता सम्मान ही नहीं बढाती बल्कि विरोधियों को भी जन्म देती है। अनेकों पुराने सैनिकों को पद्मसिंह की तरक्की पसंद नहीं आयी। वह खुलकर तो कुछ कर नहीं पाये पर मौका जरूर तलाशते रहे। एक दिन उन्हें वह मौका मिल ही गया।

लड़कियों के शरीर में अचानक बहुत बदलाव होते हैं। अपने भाई को छुडाने के लिये पद्मा ही पुरुष का वेष रखकर पद्मसिंह बन रह रही थी। खुद को छिपाकर रखती। सभी से अलग स्नान आदि करने जाती। किसी के भी ज्यादा नजदीक न रहती ताकि किसी को सत्य पता न चल पाये। अपने भाई का ज्यादातर कर्ज वह चुका चुकी थी। बस कुछ ही महीने उसे इस तरह छिपकर रहना था। पर ऐसा न हो पाया। रहस्य खुल गया। ईर्ष्या से भरे लोगों को मौका मिल गया। सभी पद्मा के प्रतिकूल बोल रहे थे।

  " अरे यह तो किसी शत्रु की जासूस है। या किसी विरोधी राजा ने इसे महाराज को मारने के लिये भेजा है। इससे सब सच जानना होगा। दुष्टा आसानी से मुंह नहीं खोलेगी। पर इसका मुंह खुलबाना होगा।"

  " नहीं नहीं। मैं कोई शत्रु नहीं। भोपाल के गांव की लड़की हुं। मेरा नाम पद्मा है। मेरा भाई कैद है। उसी को छुड़ाने के लिये यहाॅ नौकरी कर रही थी। "

  पर जब हजारों झूठ एक साथ बोले जाते हैं तो सच की आवाज दब जाती है। अनेकों बार महाराज को पद्मा ने बचाया था। पर आज महाराज को भी पद्मा के शत्रु होने में संदेह न था। पद्मा को कैदखाने में डालने और कठोरता से पूछताछ करने का निर्देश देकर महाराज अपने महल चले गये। 

  झूठ की आवाज के सामने भले ही सच थोड़ी देर के लिये दब जाये पर जब मनुष्य उन झूठी आवाजों से दूर होता है तो उसके अन्तर्मन में सच की आवाज उठती है। अनेकों लोग उसे सुनकर भी अनसुना कर देते हैं। कुछ ही ऐसे होते हैं कि अपने अन्तर्मन में उठी सच की आवाज को सुन अपनी गलती सुधार देते हैं। बस यही छोटी सी बात उन्हें महान बना देती है। 

  महाराज को अपने महल गये अधिक समय नहीं हुआ। उनका मन परेशान होने लगा। मन के कौने से आवाजें आने लगीं कि यदि पद्मा शत्रुओं से मिली है तो उसने अपनी जान पर खेलकर भी मुझे क्यों बचाया। याद करने पर ऐसे अनेकों क्षण याद आये कि पद्मा ने महाराज के लिये खुद के प्राण भी दाव पर लगाये। थोड़ी देर पूर्व जिसे शत्रुओं की जासूस समझ रहे थे, अब वह खुद की बेटी लगने लगी। अरे यह मेने क्या किया। बेटी को पूछताछ के लिये सैनिकों के हवाले कर आया। पुरुषों के मन में कोई दया नहीं होती है। पता नहीं उसके साथ कैसा व्यवहार कर रहे हों। 

   महाराज कैदखाने की तरफ भागे और पद्मा के पास पहुंचकर ही रुके। सचमुच पद्मा की हालत ठीक न थी। 

  " बेटी। मुझे माफ करो।" 

  ग्वालियर नरेश खुद पद्मा के सामने झुके थे। बचपन में ही पिता को खो चुकी पद्मा के जीवन में आज ईश्वर ने पिता की कमी भी पूरी कर दी। 

  भोपाल नरेश से विनती कर और महाजन का कर्ज खुद अदा कर जौरावर सिंह को ग्वालियर नरेश दौलत राव सिंधिया ने आजाद कराया। अपनी छोटी बहन की बहादुरी सुन खुद जौरावर सिंह आश्चर्य में पड़ गया। महाराज ने जौरावर सिंह को अपनी सेना में नौकरी दी। तथा पद्मा का विवाह ठीक अपनी पुत्री की भांति अपनी सेना के एक अधिकारी से कर दिया। महाराज ने जीवन पर्यंत पद्मा को अपनी पुत्री ही माना।

समाप्त 
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'