चाय जैसी जिन्दगी अपनी,
तुझ बिन मैं क्या? मुझ बिन,
तू क्या? मैं ठहरी पानी सी,
रंगहीन! तूने मुझे अपने में,
समेट कर प्रेम के रंग में रंग दिया!!
मैं और तुम, साथ में
दोनों बच्चे, चारों,
खुद ब खुद एक होकर,
चाय बन गए!!
उपर से तेरा प्यार अदरक
इलायची की तरह, चाय में,
खुशबू का काम करती है!
जो भी मिले!!
तारीफ किए बिना न रह सकें,
हम दोनों की। प्यार में घुलकर,
चलो चलें!
एक कप चाय साथ पिए!!

श्वेता कर्ण

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