इस दुनियां में असली नकली 
एक -सा  वे दिखते  हैं  सदा।
असली  तो  होता है  असली ,
नकली  धोखे  में  ही   जीता।।

असली को चिंता नहीं होता,
जैसा  है  वह  वैसा   रहता ।
नकली  को  भय  घेरे रहता,
डर डर के वह जीता  रहता।।

नकली सदा सोचता रहता,
कही न पकड़ा ही जाऊं मैं ।
डर  के  साये  में वह जीता,
मरता कई बार  जीवन  में ।।

नकली  नया कुछ नहीं करता,
झूठी  दुनिया   में  वह  जीता।
जीवन  में  अपयश  ही  पाता ,
यश से वंचित  सदा ही रहता।।

नकल  दूसरों  का क्या करना!
निज बल पर तुम करो भरोसा।
होगा  सफल  प्रयास   तुम्हारा,
तेरे  कदमों  में  होगी   दुनियां।।

एक अनोखे तुम इस जग में,
तुझ सा है कोई  नहिं  दूजा।
निज तेज से करो कुछ ऐसे,
अनुगामी हो जग यह  तेरा।।
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर "
(यह मेरी मौलिक रचना है। सर्वाधिकारसुरक्षित।)