रंग भेदभाव
सुलोचना जी जल्दी जल्दी घर का काम निबटा रही थी,उनकी बहू किचिन मे पकवान बना रही थी ,और बडबड़ा भी रही थी ।
पता नही कब रिश्ता तय हो ये रोज रोज की झंझट से छुटकरा मिलेगा ।
खैर सब हो गया,सुलोचना जी अपनी बेटी के कमरे मे गई,अरे मालनी तू अभी तक तैयार नही हुई बस आते ही होगे सब लोग ,####फिर मालनी को तैयार किया ।कितनी सुन्दर लग रही है मेरी गुड़िया .......
क्यूँ बोलती हो माँ.............. कोई पसंद नहीं करेगा मुझे क्युकी मै काली हू ,सब को गोरी दुल्हन चाहिए काली नही ,बोल के रो पड़ी माँ ने अपने सिने से लगा लिया और वो भी रो पड़ी तभी उसका बेटा राघव आता है।
चलो माँ सब आ गये ।
..........माँ ने तो अपनी बेटी की खूब तारीफ की ,पर जब सबने मालनी को देखा तो नाक,मुह सिकोड़ने लगे,और बोला कि हमे काली बहू नही चाहिए।।
......मालनी को ये शब्द सुनने की आदत हो गई थी 6वी बार उसको ना सुनना पड़ा,उसके सिने मे दर्द ,सर भी भारी होने लगा सब तो उसे कह देते है काली लड़की नही चाहिए ,पर उसे कितना दर्द होता है ये कोई ये जानता उसका दिल तार तार हो जाता है पर वो क्या करे ।
पापा के जाने के बाद भाई ही सारा घर का खर्चा चलाते है,वो सामने तो कूछ नहीं बोलते पर भाभी के सामने खूब खरी खोटी सुनाते हैं ।
माँ भी क्या करे उसको भी बिमारियों ने घेर रखा है वो चाहती है की जल्दी से मेरी शादी हो जाए।
3दिन बाद फिर कूछ लोग मालनी को देखने आते है पर इस बार भी वही सब सुनने को मिलता है ....
.............हमे काली बहू नही चाहिए ।
अब तो भाभी ने भी ताने देने लगी
मम्मी जी अब ये सब बन्द करिए रोज रोज इतना तामझाम नही होगा कोई आपकी काली बेटी से शादी नही करेगा ,नाश्ता ,इसके कपड़े,और मेकप मे इतना खर्चा हो जाता है।भाई भी बोल रहा था की ये काले रंग की बहन ही मुझे मिलनी थी शर्म आती है मुझे ।भाई के मुह से ये सुन के मालनी को बहुत ही आघात लगा पर वो क्या करे ।
माँ भी लाचार है माँ है ना क्या करे जहा कोई अच्छा लड़का बताता है तो वो अपनी बेटी के लिये बोलने लगती है ,उसे लगता है की काश ये रिश्ता तो तय हो जाए पर बार वही होता ,हमे काली बहू नहीं चाहिए।
अब तो कोई आता ही नही है।
कूछ महीने बाद फिर से कूछ लोग आते है ,सुलोचना ने अपनी बेटी को तैयार किया ,मालनी बुत बन के थी ।
वो बोली अपनी माँ से की क्यों करती हो कोई नही मुझे पसन्द करेगा ,माँ अपने आसूँ पोछते हुए बोली की करेगे बेटा ।
आ गए देखने वाले माँ अपनी बेटी को ले के आई ,पर ये क्या उन लोगो के बोलने से पहले ही मालनी बोल पड़ी ..........हमे,काली बहू नही चाहिए ,मुझे हर बार यही सुनने को मिलता है सब मुझे ताने देते है की मै काली हू ,मेरा रंग काला है मुझे कोई पसंद नहीं करेगा ।थक चुकी हू मै ये सुन सुन के ।
इ ...........इसमे मेरी क्या गलती है मै काली हू तो मेरा रंग काला है तो मुझे कितनी तकलिफ होती है
दर्द होता है ये सुन के ये कोई नही सोचता ,मेरे भाई को शर्म आती है मुझे अपनी बहन कहते हुए ,भाभी मुझसे दूरी बना के रखती है उनको लगता है की वो मेरे पास आएगी तो वो भी काली हो जाएगी ,माँ तो माँ ही है वो तो मेरा अच्छा ही सोचेगी।
मुझे बिकने के लिये आप सब के सामने ला के रख दिया जाता है।
पर बिक नही पाती ।
सब उसको देखते ही रहे ,पता ही नही उसमे आज इतनी शक्ती कहा से आ गई,आज उसने सबको सुना दिया ।
अपने कमरे में गई कूछ अपने जरुरत के समान रखे और बहार आ के बोली माँ मे जा रही हू ,मै अब और अपना तमाशा नहीं बना सकती ,रोज रोज सबके ताने नही सुन सकती।
कहा जाऊगी ,कहा रहूँगी पता नही पर अपनी पहचान बनाऊगी ताकी मुझे कोई बार बार ये न कहे
की हमे काली बहू नही चाहिए ।
माँ तुम से बात करती रहूँगी अपने आसूँ पोछे और निकल गई अपनी मंजिल की ओर।
सच मे ये भेद भाव क्यू होता हैं
सब सुरत ही क्यू देखते सीरत क्यू नही ।
मेरी ✍से

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