तेरी  यादों  के  खंजर  दिल  में  उतरते  हैं
चाहत  की  गली  से  जब  हम  गुजरते हैं

टूट  के  चाहा  तुझको ,तेरी,चाहतों में टूटे
तेरे  दर्द  से   हम   दिन  रात   सिहरते  हैं

बुझ   गई   तेरे  दर्द  में, मेरे  प्यार की शमां
वक़्त की आंधियों में क्यूं मेरे अरमां बिखरते हैं

रातों  में  नींद  नहीं  आती  आजकल  हमको
खुली  आंखों  से  तेरा  ख़्वाब देखा करते  हैं

@भूपेन्द्र चौहान “राज़” रतलाम जून,