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अभी जब मैं मां के लगाए हुए फूलों के बगीचे में बैठा हूं तो हवा के झोंको से हरसिंगार के छोटे-छोटे फूल टूट-टूट कर गिर रहे हैं.... ऐसा लगता है जैसे वे मां को श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं। इन छोटे-छोटे फूलों की महक में मैं मां की आत्मा की सुगंध बखूबी महसूस कर रहा हूं। आंखों में उमड़ रहे आंसुओं को रोकना अब मेरे लिए मुश्किल हो रहा है। गीले हो चुके कागज के पन्नों को हटाकर मैं जब दुबारा लिखने बैठा हूँ तो समझ में नहीं आ रहा है कि कहां से शुरू करूँ?
इस छोटे से शहर में पिताजी के द्वारा बनवाए गए मकान में मेरे बचपन का काफी हिस्सा बीता है। इस मकान को पिताजी ने तब बनवाया था जब हम चार भाई-बहन अपनी पढ़ाई कर रहे थे। एक अध्यापक की नौकरी, जो की विशुद्ध रूप से एक नंबर की कमाई की थी, उसमे से मां ने एक-एक पैसा जोड़कर अपना सहयोग दिया था तब जाके यह मकान पूरा हुआ था।
धीरे-धीरे समय के साथ हम सभी भाई-बहन बड़े हो गए, बहनों की शादी हो गई और हम दोनों भाइयों ने भी अपनी नौकरी की सुविधा के अनुसार अपने अपने आशियाने बना लिये। पिताजी के रिटायरमेंट और दिवंगत होनें के बाद मां हम लोगों के साथ कहीँ भी जाने को राजी नहीं हुई और ना ही गांव पर रहना पसंद किया। थक हार कर हम लोगों ने मकान के एक हिस्से को किराए पर रखा ,एक आया की व्यवस्था कर उनकी भावनाओं को जिंदा रखने की कोशिश की।
संयोग से कुछ वर्ष पूर्व मैं भी नौकरी के चलते अपने शहर के पास ही आ गया था तो मां के करीब रहने का मौका मिलने लगा था।
मेरे उस मकान में रहने के दौरान एक दिन मां नें ऑफिस से घर लौटने के बाद बताया-
"आजकल घर में पास के गोदाम से बड़े-बड़े चूहे आ गए हैं, मुझे बहुत परेशान करते हैं -जरूरी सामान भी लेकर भाग जाते हैं।"
मैंने सुझाव दिया -"इसमें क्या है ? आज ही दवा रखवा दो कल से एक भी नहीं दिखाई पड़ेंगे।"
"क्या तुम उनकी हत्या करोगे? यहां पर यह सब नहीं होने दूंगी मैं।"
उसने आंखें तरेरते हुए मुझसे कहा।
मैं समझ गया.. वह परेशान भले हो जाएगी लेकिन उन्हें मारने का पाप नहीं लेगी।
किसी तरह समझा-बुझाकर चूहेदानी लगानें पर उसे राजी कर लिया लेकिन चूहे बड़े-बड़े थे, तो रोटी भी खा लेते थे और निकल कर भाग भी जाते थे।
अपनी इस नाकामी पर मां ने हंसते हुए कहा- "जाने दो वो सामान ही खाते हैं जान तो नहीं लेते ना किसी का?" मैं निरुत्तर था।
ऐसे ही जब बंदरों का झुंड जब आता तो उसके फूलों के बगीचे को तहस-नहस कर डालता। वह थोड़ा गुस्सा होती फिर कहती - "जाने दो एक-दो दिन में वो खुद ही चले जाएंगे आखिर इनका कोई अस्थाई घर तो है नहीं।"
उसके दरवाजे पर जब भी कोई भिखारी आवाज देता तो वह पहले से ही छुट्टे पैसे और सामान तैयार रहती है ताकि कोई खाली हाथ दरवाजे से चला जाये। कभी-कभी जब देर होने पर कोई भिखारी वापस लौटने लगता तो उसे बुलवा कर भी खाने को देती थी।
इधर कुछ महीनों से वह लगातार कह रही थी-" मैंने सभी तीर्थ यात्रा पूरी कर ली है ,अब बस एक ही इच्छा है कि भागवत सुन लूँ।"
मैंने उसे अपना कार्यक्रम कुछ दिनों के डालने की बात करी तो वह चुप लगा गई फिर एक दिन अचानक उसने अपना फैसला सुना दिया - "मैंने महाराज जी से बात कर ली है, तारीख भी तय हो गई है।"
"लेकिन मां ....."
मैंने उसे टोकना चाहा।
"नहीं अब कोई टालमटोल नहीं चलेगा, तुम लोग रहोगे तो भी ,नहीं रहोगे तो भी अब यज्ञ तो होकर रहेगा। मैं जानता था कि उसने एक बार सोच लिया ...तो बहुत मुश्किल है उसे समझाना।
फिर भी मैंने उसे बताना चाहा ...तो वो मुझे ही समझाने लगी--" देखो अभी मैं ठीक हूं, चल फिर सकती हूं बाद में मुझसे बैठा भी नहीं जाएगा तो कैसे भागवत सुन पाऊंगी? और फिर पके आम क्या भरोसा कब गिर जाये।"
इतना सुनने के बाद मेरे पास कोई जवाब नहीं था ,सिवाय हां करने के।
श्रीमद्भागवत यज्ञ बड़े धूमधाम के साथ संपन्न हुआ लेकिन लगातार जागरण व थकान के कारण तीन चार दिन बाद ही अचानक साइलेंट हार्ट अटैक आया और नियती नें उसको हमसे छीन लिया।
भागवत के समय जब भी मैं अपने शहर जाता था तो मां याद दिलाना नहीं भूलती "तुम घर का ताला खोलकर फूलों में पानी जरूर दे देना ,मेरे फूल-पत्ते सूखने नहीं चाहिए,एक-दो काम नहीं हो पाए तो कोई बात नहीं।"
मुझे पता था कि फूलों से उसे बहुत लगाव था इसलिए मैं दो बार झूठ बोल कर भी कम से कम एक बार पानी जरूर दे आता था।
मां के जाने के तुरंत बाद ही मेरे छोटे भाई को कोविड के इंफेक्शन के कारण पटना में हॉस्पिटलाइज करना पड़ा।
लगातार हॉस्पिटल में कई दिन रहने के कारण कोई भी मकान पर नही जा पा रहा था। मुझे भी अपनी परेशानियों के कारण फूलों की याद नहीं आ रही थी।
इसी बीच अचानक मुझे अत्यावश्यक काम से घर आना पड़ा मैंने जब मकान का ताला खोला तो गमलों में लगे फूल अपनी अंतिम सांसे गिन रहे थे। जाने क्यों मुझे उस वक्त ये लगा कि इन फूलों को जिंदा रखना बहुत जरूरी है। मैं तुरंत पानी का पाइप उठाकर उनमें पानी डालने लगा। कुछ देर बाद ही फूल-पौधे थोड़े ताजे से दिखने लगे। इधर शाम को जब मैंने भतीजे को मैंने फोन किया तो उसने बताया- " आज पापा जी का ऑक्सिजन लेवल काफी बढ़ गया है"। आज वोबपहले से वह काफी खुश दिख रहा था.... "आज उन्होंने कई दिनों बाद कुछ खाया भी है।"
उंसने मुझे अच्छी खबर सुनाई थी। मैं किसी भ्रम में बिल्कुल नहीं था, मुझे मां की आवाज साफ साफ सुनाई पड़ रही थी -"बेटा पौधों में पानी जरुर डाल देना।"
आज मेरा भाई पचासी प्रतिशत फेफड़े के इंफेक्शन के बावजूद सही सलामत है। शायद उन पेड़-पौधों नें जरूर दिल से दुआ दी होगी तभी मेरा भाई मौत के मुंह से वापस लौट आया है ।
मौलिक व स्वरचित- सूर्येन्दु मिश्र 'सूर्य'

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