जिनके खत देते रहे, जीवन को आनंद।
जाने कब से हो गए, अब उनके खत बंद।।

उनके खत से बरसता, था इतना स्नेह।
जैसे सावन की झड़ी, हो सरिता के गेह।।

किंतु खतों पर पड़ गई, आज वक़्त की मार।
धीरे धीरे छिन गई, आज नेह बौछार।।

उन पत्रों को आज तक, हमने रखे सम्हाल।
जिन पत्रों ने ला दिया अंतस में भूचाल।।

कोरे पन्ने पर रखा, तुमने हृदय निकाल।
भरे हुए अनुराग से, वो खत लगें कमाल।।

शब्द शब्द जादू करें, मन लेते  थे जीत।
वह खत फिर से भेज दो, मेरे मन के मीत।।

वो खत आज भी, हैं मुझको अनमोल।
जिनमें दिखते आपके, प्रीत भरे सब बोल।।


श्वेता कर्ण