अब रेत भी शर्मिंदा हैं
अंतिम संस्कार भी नहीं हुए जिनके
उनकी संतानें कैसे जिंदा है
फट गया होगा कलेजा उसका
रूह उसकी भी थर्राई होंगी
जिसके गोद में खेला पूरा जीवन
अंगुली पकड़कर चलना सीखा
बस दृश्य चहूओर से उसके सामने
बार -बार बचपन की दृश्य घुमकर आई होगी
आंसूओं से भरी होगी वह आंखें
जब अंतिम संस्कार तक न कर पाई होगी
पावं भी जम गया होगा उसका
कदम भी उसकी लड़खड़ाई होगी
क्या थी उसकी इतनी वेबसी उनकी
जो उन्होंने शव को ऐसे दफनाई होगी
प्रकृति भी दे गई चेतावनी
मानवता के होते अंत की
सोचों यदि नहीं आती तुफाने
तो किनारे कितने राज सबने दफनाई होती
ना गंगा घाट पर दिखते दफन शव
ना नदियों में शव उतराई होती
ना अमानवीयता का चेहरा दिखता
ना की शासन प्रशासन की लापरवाही होती
ना होता मानवता कलंकित
ना ही मजबूरी किसी की सामने आई होती
नदियों बहती जाती चुपचाप शवों के साथ
ना नदियों में शव सभी उतराई होती
मित्र

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