बदल गया है मिजाजे मौसम,
पर तुम न यों बदला करो,
सारी दुनिया रहती है एहतियात से,
तुम भी दूर हयातों से ,अपना नाजुक दिल रख्खा करो।

कुछ अपनी कहो ,कुछ सुनो हमारी,
अपनी खिल खिलाती हँसी से फैला दो खिजा में खुमारी,
यों क्यों खुदको अकेला कर बैठे हो,
मिलो न कोई बात नहीं झरोखों से तो दिखा करो।


  बहुत ही ज्यादा है कातिल, सबसे जुदा है,
बात बात पर नखरे वाली जो तेरी अदा है,
पर देखो  कुछ न पता कल क्या हो,
मानो राय हमारी सबसे सुलाह रख्खा करो।

देखके तुमको सारी सुस्ती हट जाती है,
कब कहते तुम वे बजह घूमों ,
ढक कर पहरन से यह हुस्न का ताजमहल,
खुली आँखे से तेरी तड़पे दिल ,
ऑक्सीजन पा लेंगे , यह शबाब किया करो

तुमने किया नो वादे वफ़ा है,
देखो उसको भी करना अदा है,
हुस्न की बातें हम नही करते अंजुम,
तुमसे मिलती अपनी तबियत बस,
तबियत का ख्याल रख्खा करो

बहुत वेकरारी जब बड़ जाए,
मिलने की कोई सूरत नजर न आए,
सारी दूरी मिट जाए तेरी सूरत नजर आ जाए,
मानो सलाह हमारी डिजिटल हो गयी दुनिया सारी,
तुम भी हो जाओ , वो जादुई की बोर्ड , रख्खा करो।

अंजू दीक्षित,
 बदायूँ,उत्तर प्रदेश।