अति रहस्यमयी कुंजीपटल है,
संगणक का या टंकणयंत्र का।
हल्के प्यार भरे स्पर्श मात्र से,
सुंदर छबि छोड़ जाता अपना ।।
एक एक सब मिल कर कुंजियाँ,
अद्भुत- सा नृत्य पटल पर करती।
अपने नृत्य से कितनी कृतियाँ,
दर्शक को वे प्रस्तुत कर देती।।
बदला रूप लेखनयंत्र सदा ,
टंकणयंत्र से वह संगणक हुआ।
संगणक सुवाह्य संगणक हुआ,
कुंजीपटल फिर भी वही रहा।।
कुंजीपटल पर ज्योंही उंगलियां,
थिरक कर कुंजियों को नचाती।
सुंदर लेखन सदा वह करता ,
कभी-कभी चित्रकारी करता।।
धन्य हैं क्रिस्टोफर शोल्स जिसने,
अद्भुत कुंजीपटल जो बनाया।
लेखन की दुनियां में जिसने ,
रहस्यमयी कुंजीपटल लाया।।
अति रहस्यमयी कुंजीपटल है,
लेखन में जादू कर डाला ।
यह जग चाहे जितनी बदले,
पर यह कभी नहीं है बदला।।
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर"
(यह मेरी मौलिक रचना है। सर्वाधिकारसुरक्षित।)
(मुखचित्र गूगल से साभार)

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