क्या पाया क्या खोया

धन कमाने की लालसा में बहुत आगे निकल गए ,
पीछे मुड़कर देखा तो सभी अपने बिछड़ गए।

दौड़ ऐसी लगाई कि आसमां तक पहुंच गए ।
कामयाबी सिर  चढ़ जब बोली, अहम को दिल में भर लिए।
मेंरे सामने सब छोटे खुद से फूलते गए,
कभी जो सच्चे साथी थे उनको भूलते गए।
पीछे मुड़कर देखा तो सभी अपने बिछड़ गए।

चूल्हे में रोटी सेंकती  मां ,आंखों से पानी  निकलता था ।
बालों में कंघी करती चाची की, आंखों में प्यार बसता था।
धन इतना कमाया कि आलीशान रिजॉर्ट तक पहुंच गए ।
कोई भी चीज़ ऐसी नहीं जो अब मयस्सर न हो  सके।
पीछे मुड़कर देखा तो सभी अपने बिछड़ गए।

कभी दाल रोटी खाकर खुश बहुत रहते थे।
मिट्टी के मटके का ठंडा ठंडा पानी पीते थे।
अब तो पिज्जा बर्गर सैंडविच  के अभ्यस्त हो गए।
फ्रिज का ठंडा पानी तरह तरह के ड्रिंक हो गए।
पीछे मुड़कर देखा तो सभी अपने बिछड़ गए।

एक ही कमरे में पूरा का पूरा परिवार सोता था ,
मां दादी की कहानियों से रात का जश्न मनता था।
कभी अंताक्षरी होती तो गाने का होड़ लगता था ।
धन इतना कमाया कि वे फर्निश्ड विला तक पहुंच गए ।
हर बच्चों के लिए अलग अलग कमरे हो गए।
अब तो डनलप के गद्दे सभी बेड पर बिछ गए।
पीछे मुड़कर देखा तो सभी अपने बिछड़ गए,

पर उन गड्ढों पर नींद अच्छी आती नहीं है,
रात आंखों में कटती है भोर में आंख लग जाती है।
हफ्तों और महीनों तक उगता सूर्य न देख सके,
अब तो तन और मन से भी बहुत कमजोर हो गए।
पीछे मुड़कर देखा तो सभी अपने बिछड़ गए ।

वह आम की अमराई वह साथियों का चौपाल ।
पूरी गली मोहल्ले में सब मिल मचाते थे धमाल ।
महकती महुआ पीली सरसों का रंग सुगंध भूल गए।
सावन भादो की बारिश कागज़ की नाव भूल गए।
पीछे मुड़कर देखा तो सभी अपने बिछड़ गए ।

खामियाजा भुगता  है बहुत धन कमाने की लालसा की।
गांव से शहर शहर से चांद तक पहुंचने की।
साइकिल से स्कूटर कार ,कार से एरोप्लेन की ।
नतीजा सामने जब आया उस नतीजे से डर गए ।
पीछे मुड़कर देखा तो सभी अपने बिछड़ गए।

स्नेहलता पाण्डेय"स्नेह"
नई दिल्ली