वो बचपन कितना खूबसूरत था।

वो कागज की कश्ती थी, वो रेत का महल था,
वो बुलन्दी को छूती कल्पनायें थी मुट्ठी में आसमाँ था।

गम की  कोई परिछाई न थी खुशियों से भरा हर इक पल था,
भेदभाव न था मन में मन निश्छल था मन निर्मल था।

वो स्कूल का टिफिन दोस्तों संग  मिल बांटकर खाना,
वो होमवर्क के बहाने दोस्तों के घर टीवी देखने जाना।

वो चूरन की पुड़ियाँ थी वो आइसक्रीम और बर्फ के गोले थे,
कितनी प्यारी वो  गलियां थी जिन गलियों में हम खेले थे।

वो अनपढ़ सी बातें थी वो मस्ती भरी शैतानियां थी,
जहां रोज सुनाती दादी-नानी वो परियों की कहानियां थी।

बारिस के मौसम में वो छत पर पतंग  पतंग उड़ाते थे,
कागज की कश्ती बना कर फिर पानी में तैराते थे।।

.....शीला द्विवेदी"अक्षरा"......