टाइपराइटर के सामने,
बैठती माँ जब विरंचि जैसा।
उंगलियां तब लगती नाचने,
कागज पर सृजनकार्य होता।।
टक् टक् की वह नाद सुरीली,
कानों में ज्यों शहद घोलती।
तीव्र गति से जब वह चलती,
लगे ओंकारनाद ब्रह्मांड की।।
टेढ़ी लकीरें आशुलिपि की ,
कागज पर अक्षररूप पाती।
देख जादू माँ के हाथ की,
सम्मोहन मुझ पर छा जाती ।।
माँ की है यह बड़ी चहेती,
उसे साफ सुथरा वह रखती।
कितने अक्षर रूप रचित हुई,
इतिहास कई हैं सृजित हुई।।
आज नहीं प्यारी माँ मेरी,
यादें छोड़ गई वह अपनी।
जब भी आती याद माँ की,
टाइप करती सी वह दिखती।।
सुंदर टाइपराइटर माँ का ,
आज भी वहीं शोभा पाता।
माँ की याद में विकल होता,
इस पर मैं खत माँ को लिखता।।
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर "

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