वो क्या  दिन भी थे,अलमस्त ,किशोरावस्था से जवानी की दहलीज पर कदम ,ना कोई फ़िक्र न चिंता।
निकल पड़ते थे,  सहेलियों के साथ ,मार्केट।,.. और मार्केट का मतलब लौटते समय  गोलगप्पे,चाट टिक्की ।ये नहीं खाया तो हमारी यात्रा ,(सामान लेने कि) कैसे पूर्ण होती🤔।
कुमकुम मेरी सहेली है,जिसके बिना हमारी कहीं की यात्रा अधूरी ही होती ।हम दोनों के जीवन में कोई बातें छुपी नहीं होती थी।कभी मै उसे सलाह देती ,तो कभी वो।

एक दिन दोनों मिले।तय हुआ चल ,आज गोलगप्पे खा कर लौट आते हैं।दोनों निकल लिए।

रूपेश जो मुजफ्फरपुर में एमबीए कर रहा था , बहुत ही स्मार्ट और हैंडसम था,मोहल्ले की लड़कियां  उसकी दीवानी थी,छुट्टियों में आया था।

हमारे ही घर के कुछ दूर पर रहता था,।हमने देखा, वो पीछे से अपने दोस्तों के साथ चला आ रहा था।

हमें लगा वो ,यूं ही घूमने निकला होगा ,हमने 
कोई ध्यान नहीं दिया।

हमलोग गोलगप्पे के ठेले के पास रुके,और उससे 10 रुपए के गोलगप्पे खिलाने को कहा।
तब तक रूपेश भी वहां आ गया,और वहीं खड़ा हो ,हमे निहारने लगा ।कुछ अटपटा सा लग रहा था हमें,गोलगप्पा खाना ,और किसी का लगातार घूरना ,अलग अलग भाव हमारे मुखमंडल पर आ  रहे थे।

आखिर ठेले वाले ने हमारी असमंजसता की स्थिति को समझा, और उन लोगो से पूछा_क्यों भाई आप लोगो के लिए भी बनाऊं ,चाट ,टिक्की ,गोलगप्पे।

वे भी सकपका गए,जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो।उन्होंने कहा हां गोलगप्पे बना दो।
वो फंस गए,गोलगप्पे खाने में, और हम तुरंत अपना गोलगप्पा खा  रफूचक्कर हो गए।

वो रूपेश और कुमकुम की ठेले  पर पहली मुलाकात थी।उसके बाद दोनों  आपस में  मिले ।रूपेश की नौकरी चंडीगढ़ में हो गई ,लेकिन जाति ,और पारिवारिक दबाव के कारण एक नहीं हो पाए।दोनों ने ही परिवार को अपने प्यार से ज्यादा महत्व दिया और जुदा हो गए।

लेकिन वो अनकही प्यार कि टीस जो ठेले  के पास मिली ,सदा के लिए दोनों के दिलों में अंकित हो गई। 
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                    समाप्त